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संपादकीय: कुर्दों पर हमले

कुर्द सैनिकों ने बड़ी संख्या में आइएस के लड़ाकों को स्थानीय जेलों और शिविरों में बंद कर रखा था।

Author Published on: October 15, 2019 1:25 AM
सीरिया में भी आइएस के लड़ाकों से मुकाबले में अमेरिका के साथ कुर्द ही कंधे से कंधा मिला कर खड़े रहे हैं। (सांकेतिक तस्वीर)

उत्तर-पूर्वी सीरिया में कुर्द सैनिकों और तुर्की की सेना के बीच पिछले पांच दिन से चल रही लड़ाई ने इस क्षेत्र को गंभीर संकट में झोंक दिया है। तुर्की की सेना सीरिया के उत्तर-पूर्व में कुर्द बहुल इलाकों में ताबड़तोड़ हमले कर रही है और कुर्दों पर कहर बरपा रही है। बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने और जख्मी होने की खबरें हैं। लाखों बेघर हो गए हैं। इससे गंभीर मानवीय संकट खड़ा हो गया है। तुर्की की सेना ने सीरियाई शहर सुलूक पर कब्जा कर लिया है। पश्चिम एशिया का यह क्षेत्र युद्ध के नए अखाड़े में तब्दील हो गया है। मामला ज्यादा गंभीर रूप इसलिए ले चुका है कि इस संकट के मूल में अमेरिका है। उसके अपने हित हैं, ऐसे में इस समस्या के सुलझने के आसार दूर-दूर तक नहीं हैं।

अब यह साफ हो चुका है कि अगर अमेरिका सीरिया और तुर्की की सीमा से अपने सैनिकों को हटाने का फैसला नहीं करता तो आज हालात नहीं बिगड़ते। ट्रंप अगले राष्ट्रपति चुनाव की तैयारियों में जुटे हैं और उन्होंने अमेरिकी जनता से वादा किया है कि अफगानिस्तान और सीरिया जैसे देशों से अमेरिकी सैनिकों की वापसी होगी। अफगानिस्तान से तो यह संभव नहीं हो पाया है, लेकिन सीरिया में इस फैसले का असर तुर्की के हमले के रूप में आया है। अमेरिकी सैनिकों के हटते ही तुर्की ने कुर्दों के नियंत्रण वाले ठिकानों पर हमले शुरू कर दिए।

तुर्की में बीस फीसद कुर्द आबादी है। तुर्की कुर्दों को आतंकवादी करार देता आया है। दरअसल, इराक, सीरिया और तुर्की के कुर्द बहुल क्षेत्र में रहने वाले कुर्द सुन्नी मुसलमान हैं और लंबे समय से अलग कुर्दिस्तान राष्ट्र के गठन के लिए लड़ रहे हैं। ऐसे में तुर्की को यह डर सता रहा है कि अगर अलग कुर्दिस्तान राष्ट्र बन गया तो उसके यहां की बीस फीसद कुर्द आबादी भी उसके लिए बड़ा संकट बन जाएगी।

ट्रंप ने कुर्दों की वफादारी पर सवाल उठाते हुए यहां तक कह डाला कि इस्लामिक स्टेट (आइएस) के साथ लड़ाई में कुर्दों ने अमेरिका का साथ नहीं दिया। जबकि इराक में सद्दाम हुसैन की सत्ता को उखाड़ फेंकने में अमेरिका का सबसे ज्यादा साथ तो कुर्द लड़ाकों ने ही दिया था। सीरिया में भी आइएस के लड़ाकों से मुकाबले में अमेरिका के साथ कुर्द ही कंधे से कंधा मिला कर खड़े रहे हैं। अब संकट यह भी है कि तुर्की के हमलों के इस इलाके में आइएस फिर से सक्रिय हो सकता है।

कुर्द सैनिकों ने बड़ी संख्या में आइएस के लड़ाकों को स्थानीय जेलों और शिविरों में बंद कर रखा था। लेकिन हमले के बाद आइएस के ज्यादातर लड़ाके भाग निकले हैं। पश्चिमी देशों सहित सऊदी अरब जैसे देश तुर्की की इस कार्रवार्ई के खिलाफ हैं, वहीं पाकिस्तान ने तुर्की के रुख का समर्थन किया है, क्योंकि कश्मीर के मुद्दे पर तुर्की पाकिस्तान के साथ खड़ा है। लेकिन भारत ने सीरियाई क्षेत्र की संप्रभुता की रक्षा पुरजोर वकालत करते हुए तुर्की के हमलों की कड़ी निंदा की है और इसे गंभीर मानवीय संकट बताया है। पर बड़ा सवाल यह है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का झंडा उठाने वाला अमेरिका अपने स्वार्थ के लिए कब तक निर्दोष नागरिकों को युद्ध की आग में झोंकता रहेगा!

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