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मतभेद का सिरा

असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी की सूची जारी होने के बाद से ही इस मुद्दे पर जिस तरह उथल-पुथल शुरू हुई थी, उसका असर राजनीतिक दलों के बीच तालमेल पर पड़ना लाजिमी था। सोमवार को यह औपचारिक रूप से भी सामने आया जब असम गण परिषद (अगप) ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से भी बाहर होने की घोषणा कर दी।

Author January 9, 2019 3:35 AM
प्रतीकात्मक फोटो (Source: PTI)

असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी की सूची जारी होने के बाद से ही इस मुद्दे पर जिस तरह उथल-पुथल शुरू हुई थी, उसका असर राजनीतिक दलों के बीच तालमेल पर पड़ना लाजिमी था। सोमवार को यह औपचारिक रूप से भी सामने आया जब असम गण परिषद (अगप) ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से भी बाहर होने की घोषणा कर दी। हालांकि इसका असर राज्य में भाजपानीत सरकार के समीकरण और संख्याबल पर नहीं पड़ेगा, लेकिन एक सहयोगी पार्टी के अलग होने का जो तात्कालिक संदेश राजनीतिक हलकों में जाना था, वह गया। यों कुछ अन्य क्षेत्रीय पार्टियों ने भी राज्य में अपने स्थानीय हितों और बदलती राजनीतिक तस्वीर के मद्देनजर भाजपा से अलग होने की घोषणा की है और असम गण परिषद के फैसले को भी उसी प्रकृति का माना जा सकता है। लेकिन असम में राज्य में अवैध रूप से रहने वालों की नागरिकता मतभेद का मुद्दा बना है। इसलिए यह सवाल स्वाभाविक है कि अगप का इस मसले पर क्या रुख है और उसमें राष्ट्रीय चिंता के लिए कितनी जगह है।

गौरतलब है कि केंद्र सरकार की ओर से लोकसभा में पेश नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2016 पारित हो गया, जिसमें अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से अल्पसंख्यक, यानी हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को भारत में बारह साल की जगह छह वर्ष निवास करने के बाद ही नागरिकता प्रदान करने की व्यवस्था है। ऐसे लोगों के पास कोई उचित दस्तावेज नहीं होने पर भी उन्हें नागरिकता दी जा सकेगी। असम सहित पूर्वोत्तर में एक बड़े तबके और कई संगठनों के बीच इस विधेयक को लेकर तीखा विरोध उभरा है। इसी आलोक में अगप भी केंद्र सरकार की ओर से लाए जाने वाले इस विधेयक के विरोध में है। हालांकि पिछले साल जुलाई में ही उसने अपनी यह राय साफ कर दी थी कि अगर इस मुद्दे पर सरकार आगे बढ़ती है तो असम गण परिषद राज्य में सत्ताधारी गठबंधन से बाहर हो जाएगी। यानी अगप का ताजा फैसला कोई चौंकाने वाला नहीं है। लेकिन सवाल है कि असम या देश के बाकी हिस्सों में जिस तरह अवैध तरीके से दाखिल हुए लोग रह रहे हैं और उससे कई तरह की समस्याएं खड़ी हो रही हैं, क्या वह अगप की चिंता में शामिल नहीं है!

दरअसल, लंबे समय से कुछ पड़ोसी देशों और खासतौर पर बांग्लादेश से अवैध प्रवासियों के भारत में आने का सिलसिला चलता रहा है। इस समस्या से निपटने के मद्देनजर असम में जो राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर तैयार किया गया, उसकी सूची में लगभग चालीस लाख लोग आ गए। इतनी बड़ी तादाद अपने आप में एक बड़ी समस्या है। हालांकि इस पर काफी सवाल उठे, लेकिन लोगों को अपनी नागरिकता को लेकर दावा करने और विवादों के निपटारे का मौका भी दिया गया। इससे इतर देखें तो सीमा पर ढिलाई या अन्य कई वजहों से बहुत सारे लोग मौके का फायदा उठा कर भारत में दाखिल हो गए और आज भी अवैध प्रवासियों के रूप में रह रहे हैं। उनमें से बहुत सारे लोग भारत में वोट देने में भी सक्षम हो गए। तो क्या सिर्फ इसलिए गैरकानूनी रूप से भारत में रह रहे लोगों की वजह से खड़ी होने वाली समस्या से मुंह मोड़ लिया जाना चाहिए कि उनके वोट हासिल किए जा सकें? यह ध्यान रखने की जरूरत है कि भारत में अवैध आप्रवासियों की समस्या की अनदेखी का नतीजा आज इतना जटिल हो चुका है कि इसके लिए विशेष कानूनी व्यवस्था की जरूरत पड़ रही है। अच्छा हो कि इस समस्या से निपटने के मसले पर सभी राजनीतिक दलों के बीच आम सहमति बने और एक मानवीय, लेकिन राष्ट्रहित में किसी हल तक पहुंचा जा सके।

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