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संपादकीय: सेना की चिंता

सेना ने रक्षा मंत्रालय को बताया है कि खराब गोला-बारूद से टी-72, टी-90 और अर्जुन टैंक और बंदूकों में किस तरह से हादसे होते रहे हैं। इस तरह की बढ़ती घटनाओं की कीमत सेना को अपने अधिकारियों और जवानों की जान के रूप में चुकानी पड़ती है।

Author May 16, 2019 1:15 AM
सेना की नॉर्दन कमांड ने इन राइफलों की सीधे खरीद की है। (फाइल फोटोः इंडियन एक्सप्रेस)

सेना को बेहद घटिया किस्म का गोला-बारूद मिलने की जो शिकायतें सामने आई हैं, वे चौंकाने वाली हैं। इससे इस बात का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि मोर्चे पर हमारे जवानों को कैसे मुश्किल हालात का सामना करना पड़ता होगा। यह गोला-बारूद अगर निजी कंपनियों में बन रहा होता या किसी दूसरे देश से खरीदा गया होता तो एकबारगी लगता कि इसमें गड़बड़ी हो रही होगी और मुनाफा कमाने के चक्कर में ऐसा खेल चल रहा होगा। लेकिन चिंताजनक बात यह है कि खराब गुणवत्ता वाला गोला-बारूद हमारी ही सरकारी फैक्ट्रियों में बन रहा है। सेना के लिए छोटे हथियार, उपकरण और गोला-बारूद आॅर्डनेंस फैक्टरी बोर्ड (ओएफबी) के तहत चलने वाले कारखाने बनाते हैं। ओएफबी रक्षा मंत्रालय के रक्षा उत्पादन विभाग के अंतर्गत आता है। यह मामला तब प्रकाश में आया जब पिछले कुछ सालों में इसकी वजह से टैंकों और बंदूकों में विस्फोट की कई घटनाएं सामने आर्इं। अपने ही जवानों को घटिया गोला-बारूद देकर हम देश की सुरक्षा से तो खिलवाड़ कर ही रहे हैं, जवानों की जान भी जोखिम में डाल रहे हैं।

सवाल है कि आखिर रक्षा मंत्रालय की फैक्ट्रियों में घटिया गुणवत्ता वाला सामान कैसे बन रहा है, खासतौर से गोला-बारूद, जिसका इस्तेमाल दुश्मन से मोर्चा लेते वक्त किया जाना हो। सेना में इस्तेमाल होने वाले ज्यादातर उपकरण, वाहन, हथियार आदि सरकार के तहत ही चलने वाली फैक्ट्रियों में इसलिए बनाए जाते हैं ताकि उनकी गुणवत्ता से कोई समझौता न हो सके। इनके लिए बजट भी भरपूर होता है। फिर भी अगर कोई सामान घटिया गुणवत्ता वाला बन रहा है तो यह गंभीर बात है। यह सीधे-सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला है। इससे तो यही आभास होता है कि हमारे आयुध कारखाने भी भ्रष्टाचार का अड्डा बन गए हैं। आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि गोला-बारूद तक में गुणवत्ता से समझौता किया जा रहा है। भारतीय सेना को गोला बारूद की आपूर्ति सेना के गुणवत्ता नियंत्रण महानिदेशालय से गहन जांच के बाद की जाती है। गोला-बारूद बनाने में इस्तेमाल होने वाले सभी पदार्थों की अधिकृत प्रयोगशालाओं में जांच की जाती है। सेना को दिए जाने से पहले इनके विशेष परीक्षण भी किए जाते हैं। गुणवत्ता नियंत्रण की इतनी लंबी प्रक्रिया के बाद भी अगर घटिया सामान सेना को मिलता है, तो निश्चित ही यह गंभीर मामला है और इसकी जांच होनी चाहिए।

सेना ने रक्षा मंत्रालय को बताया है कि खराब गोला-बारूद से टी-72, टी-90 और अर्जुन टैंक और बंदूकों में किस तरह से हादसे होते रहे हैं। इस तरह की बढ़ती घटनाओं की कीमत सेना को अपने अधिकारियों और जवानों की जान के रूप में चुकानी पड़ती है। सैनिकों के लिए गोला-बारूद ही एक तरह से पहला हथियार होते हैं। मोर्चे पर टैंकों और बंदूकों में गोला-बारूद ही इस्तेमाल होता है। ऐसे में अगर जवानों को देश की ही फैक्ट्रियों में बना खराब सामान मिलेगा तो मोर्चे पर कैसे टिक पाएंगे, यह किसी ने नहीं सोचा। यह देश के सैन्य साजोसामान बनाने वाले प्रतिष्ठानों की साख पर प्रश्नचिह्न है। गुणवत्ता के प्रति ऐसी गंभीर लापरवाही कहीं न कहीं संदेह तो पैदा करती है। ओएफबी ने तो इससे पल्ला झाड़ते हुए कह दिया कि हम बढ़िया गुणवत्ता वाला गोला-बारूद सेना को देते हैं, लेकिन वह इसका रखरखाव कैसे करती है, यह उसे देखना है। लेकिन सेना ने इस मामले को जितनी गंभीरता से लिया है, वह हमारे आयुध कारखानों को संचालित करने वाले तंत्र को कठघरे में खड़ा करता है। भारत को पाकिस्तान और चीन जैसे देशों से जिस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, उसे देखते हुए सरकार को इस मामले में तत्काल कदम उठाना चाहिए।

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