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सेना और शुचिता

समलैंगिक संबंधों को बेशक सर्वोच्च न्यायालय ने कानूनी मान्यता दे दी हो, पर यह थल सेना प्रमुख को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं है। उन्होंने साफ कहा कि सेना में ऐसे संबंधों को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, पहले की तरह ही यह दंडात्मक माना जाएगा।

Author January 12, 2019 3:58 AM
तस्वीर का प्रयोग प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Photo: PTI)

समलैंगिक संबंधों को बेशक सर्वोच्च न्यायालय ने कानूनी मान्यता दे दी हो, पर यह थल सेना प्रमुख को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं है। उन्होंने साफ कहा कि सेना में ऐसे संबंधों को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, पहले की तरह ही यह दंडात्मक माना जाएगा। यह एकबारगी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की अवमानना लगता है, पर सेना चूंकि बहुत अनुशासित महकमा है, इसलिए समलैंगिकता जैसी बातें उसकी साख पर धब्बा हो सकती हैं, इसलिए सेना प्रमुख ने ऐसा कहा होगा। मगर इस बात को कहने का उनका लहजा उचित नहीं कहा जा सकता। पहली बात तो यह कि क्या सेना में समलैंगिकता के मामले चिह्नित हुए हैं! अगर ऐसा है तो इसका प्रतिशत क्या है? इन बातों का अध्ययन कराए बगैर इस पर कोई बयान देने का क्या मतलब है। थल सेना प्रमुख ने कहा है कि जब सेना अधिनियम बना था, तब ऐसे मामलों के बारे में किसी ने सुना भी नहीं था, इसलिए इस पर कोई कानून बनाने के बारे में नहीं सोचा गया। पर इस अधिनियम में व्यभिचार कानून है और समलैंगिकता को भी उसी नजर से देखा जाएगा।

सेना चूंकि बहुत अनुशासित, मर्यादित और एकनिष्ठ महकमा है, यहां पर किसी तरह की उच्छृंखलता बर्दाश्त नहीं की जाती। यहां तक कि अगर कोई सिपाही या अधिकारी अपने साथी की पत्नी से संबंध बनाता है, तो उसके लिए व्यभिचार कानून के तहत कठोर सजा का प्रावधान है। ऐसे में समलैंगिकता स्वाभाविक ही सेना प्रमुख को अटपटी बात लगी होगी। मगर देखने की बात यह भी है कि अगर उनके प्रशिक्षण और अनुशासन में कहीं कोई कमजोरी नहीं है तो इस तरह की प्रवृत्ति पनपने की आशंका नहीं होनी चाहिए। यह ठीक है कि बहुत सारे सिपाही अपने घर और पत्नी से दूर रहते हैं। बहुत सारे बैरकों में साथ रहते हैं। पर समलैंगिक होने के लिए यह वजह काफी नहीं है। इसलिए पहली बात तो यह कि सेना को अपने प्रशिक्षण और अनुशासन पर भरोसा करने की जरूरत है।

अब सवाल है कि जमाने से समाज के उपहास का पात्र बने लोगों को जब सर्वोच्च न्यायालय ने सामान्य नागरिकों जैसे अधिकार प्रदान कर दिए हैं, तो सेना को उसे स्वीकार करने में क्यों गुरेज होना चाहिए! जब सेना में महिलाओं को जगह मिली हुई है, वे अपने कौशल का प्रदर्शन कर रही हैं, तो समलैंगिकों को इस अधिकार से क्यों वंचित किया जाना चाहिए! थल सेना अध्यक्ष का यह बयान एक तरह से समाज के पुरातनपंथी नजरिए का ही पोषक है। एक तरह से उनके प्रति घृणा का भाव जाहिर करता है। समलैंगिकता एक प्रवृत्ति है, जो कुछ परिस्थितियों में कुछ लोगों के भीतर पैदा हो जाती है। इनमें भी कई कोटियां हैं। इन्हें लेकर काफी अध्ययन हो चुके हैं और चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से यह कोई घृणास्पद वृत्ति नहीं है। फिर यह भी कि समलैंगिकों की काम के प्रति निष्ठा में कमी या समाज के प्रति जिम्मेदारी में कोई कमी नहीं देखी गई है। ऐसा नहीं कि वे समाज में किसी तरह का अनाचार फैलाते हों। उनमें किसी तरह से कौशल की भी कमी नहीं होती। इस तरह उन्हें सेना से दूर करना न सिर्फ काम के अवसर से दूर करना है, बल्कि उनके मौलिक अधिकारों का भी हनन है। अगर सेना को अपने अनुशासन और प्रशिक्षण पर भरोसा है, तो उसे समलैंगिकों को लेकर किसी तरह का भया या फिर भेदभाव का विचार क्यों रखना चाहिए।

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