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संपादकीय: एक और कवायद

भारतीय रिजर्व बैंक ने शुक्रवार को एक बार फिर नीतिगत दरों में कटौती करते हुए अर्थव्यवस्था की सुस्ती तोड़ने की कोशिश की है। केंद्रीय बैंक का यह कदम इस बात की ओर इशारा कर रहा है कि बाजार की हालत अच्छी नहीं है, इसलिए नीतिगत दरों में एक चौथाई फीसद की और कटौती करने जैसा […]

Author Published on: October 5, 2019 3:14 AM
रिजर्व बैंक भी इस हकीकत को भलीभांति समझ रहा है कि मंदी का माहौल जल्दी पीछा नहीं छोड़ने वाला।

भारतीय रिजर्व बैंक ने शुक्रवार को एक बार फिर नीतिगत दरों में कटौती करते हुए अर्थव्यवस्था की सुस्ती तोड़ने की कोशिश की है। केंद्रीय बैंक का यह कदम इस बात की ओर इशारा कर रहा है कि बाजार की हालत अच्छी नहीं है, इसलिए नीतिगत दरों में एक चौथाई फीसद की और कटौती करने जैसा कदम उठाने को मजबूर होना पड़ा है। हालांकि केंद्रीय बैंक पहले से कहता रहा है कि जरूरत पड़ने पर नीतिगत दरों में कटौती से वह हिचकेगा नहीं। इसलिए यह कोई चौंकाने वाला कदम भी नहीं है। इस साल सबसे पहले फरवरी, उसके बाद अप्रैल, जून और अगस्त में नीतिगत दरों में लगातार कटौती की गई थी। लेकिन आज भी उसका कोई सकारात्मक नतीजा नहीं नजर आ रहा है। अब रेपो दर एक दशक के सबसे निचले स्तर पर है। ऐसा भी पहली बार हुआ है जब साल में पांच बार नीतिगत दरों में कटौती का कदम उठाया गया हो।

बाजार में लंबे समय से बड़ी समस्या मांग नहीं होने से बनी है। इससे उत्पादन पर बुरा असर पड़ा है। माना जा रहा है कि ब्याज दरें और कम होने से लोग कर्ज लेंगे और कहीं न कहीं उद्योगों में जान आएगी। रीयल एस्टेट क्षेत्र भी रोशन हो सकता है। कुल मिलाकर सरकार के अर्थ-चक्र का गणित त्योहारी मांग पर केंद्रित हो गया है और वह भी खासतौर से घर और गाड़ियों की खरीद पर। अगर मांग निकलती भी है तो थोड़ी बहुत तेजी रीयल एस्टेट बाजार और ऑटोमोबाइल उद्योग में ही बनने के आसार हैं। लेकिन यह सोचने वाली बात है कि अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों का क्या होगा। त्वरित उपभोग वाला सामान बनाने वाली कंपनियां यानी एफएमसीजी क्षेत्र का क्या होगा जो कई महीनों से मंदी की चपेट में है। इसका वास्ता तो किसी त्योहारी मांग से नहीं होता। जबकि हाल में सरकार ने कारपोरेट करों में कटौती है और माना जा रहा है कि इससे भी कंपनियों के कारोबार में तेजी आएगी और बाजार गुलजार होंगे।

रिजर्व बैंक भी इस हकीकत को भलीभांति समझ रहा है कि मंदी का माहौल जल्दी पीछा नहीं छोड़ने वाला। नीतिगत दरों में बार-बार कटौती इस उम्मीद में ही की गई कि वाणिज्यिक बैंक ब्याज दरें घटाएंगे और इसका फायदा लोगों तक पहुंचेगा। कर्ज लेने वालों की तादाद बढ़ेगी। पर देखने में यही आया कि ज्यादातर बैंकों ने अपनी तिजोरी नहीं खोली और नीतिगत दरों के अनुरूप ब्याज दरों में कटौती नहीं की। इससे कर्ज सस्ता नहीं हुआ। अब रिजर्व बैंक ने इस बात पर सख्ती दिखाई है और यह अनिवार्य किया है कि ब्याज दरें नीतिगत दरों के अनुरूप ही रखी जाएंगी।

अगर नीतिगत दरों में कटौती का लाभ उपभोक्ता बाजार को नहीं मिलता है तो यह कदम निरर्थक साबित होता है। बैंक कर्ज सस्ते भले कर लें, लेकिन अब चौकन्ने हैं। खुल कर कर्ज बांटने से इसलिए बच रहे हैं, ताकि कहीं कर्ज डूब न जाए। छोटे उद्यमियों के लिए भी रिजर्व बैंक ने कर्ज की सीमा इसीलिए बढ़ाई है, ताकि उन्हें आसानी से कर्ज मिल सके और छोटे उद्योग रफ्तार पकड़ें। बाजार में नगदी संकट भी है। नोटबंदी के बाद से बैंकों में धन रखने को लेकर लोगों के मन में डर-सा बैठ गया है। इसलिए लोग जमा नगदी को निकालने से परहेज कर रहे हैं। पिछले दस-बारह महीने की मंदी ने लाखों लोगों का रोजगार छीन लिया है। इससे भी क्रय-शक्ति पर बुरा असर पड़ा है। ऐसे में सवाल उठता है कि इस बार भी नीतिगत दरों में कटौती क्या बाजार में जान फूंक पाएगी!

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