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संपादकीय: जुर्माना और अनुशासन

पहले भी यातायात नियमों के उल्लंघन पर भारी जुर्माने और दंड का प्रावधान किया जा चुका है, पर उसका कोई उल्लेखनीय नतीजा सामने नहीं आया। न तो लोगों में सुरक्षित चलने की प्रवृत्ति विकसित हो पाई और न यातायात उल्लंघन की दर घटी, बल्कि सड़क हादसों में निरंतर बढ़ोतरी दर्ज हुई है।

Author Published on: September 7, 2019 3:50 AM
New Traffic Rules एक सितंबर से देशर में लागू हो चुका है। (Photo: Indian Express)

जबसे मोटर वाहन संबंधी संशोधित अधिनियम लागू हुआ है, एक अजीब तरह की अफरा-तफरी का माहौल बन गया है। पिछले करीब एक हफ्ते से रोज भारी जुर्माने की खबरें आ रही हैं। किसी पर चौरानबे हजार रुपए तक का जुर्माना लगाया जा चुका है। इससे आहत होकर एकाध लोगों के पुलिस कर्मियों से उलझने और अपने दुपहिया वाहन को आग लगा देने की खबरें भी आर्इं। दरअसल, नए नियमों के तहत यातायात नियमों का उल्लंघन करने पर जुर्माने और दंड की मात्रा पहले से काफी बढ़ा दी गई है। इसलिए जिन चालकों के पास वैध कागजात नहीं हैं, वे शराब पीकर गाड़ी चला रहे थे, लाल बत्ती पार की थी आदि, तो सबको मिला कर जुर्माने की रकम हजारों में हो गई। इसे लेकर कई लोगों में रोष है। विपक्षी दल इसे रकम उगाही का नया हथकंडा करार दे रहे हैं। ऐसे में केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी को सफाई देनी पड़ी है कि भारी जुर्माने का मकसद लोगों को कानून तोड़ने से रोकना है, न कि धन उगाही। सड़क हादसे देश की बड़ी समस्या हैं, उन पर काबू पाना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। ऐसे में भारी जुर्माने के भय से लोग यातायात नियमों को तोड़ने से बचेंगे, उनमें सुरक्षित वाहन चलाने की आदत विकसित होगी।

मगर यह अनुभव नया नहीं है कि जब भी इस तरह किसी समस्या से पार पाने के लिए भारी जुर्माने का प्रावधान किया जाता है, इंस्पेक्टर राज को बढ़ावा मिलता है। यातायात महकमे में यह प्रवृत्ति कुछ अधिक देखी जाती है। यह सही है कि भारतीय सड़कों पर वाहनों की संख्या चिंताजनक स्थिति तक पहुंच चुकी है। इस पर काबू पाने के लिए उपायों पर विचार किए जाते रहे हैं। यह भी तथ्य है कि युवाओं में अनियंत्रित ढंग से वाहन चलाने और जानबूझ कर यातायात नियमों की अनदेखी करने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ती गई है। इस वजह से हादसे भी आए दिन की बात हो गए हैं। आंकड़े के मुातबिक जितने लोग गंभीर बीमारियों की वजह से जान नहीं गंवाते उससे अधिक सड़क हादसों के शिकार हो जाते हैं। भारत इस मामले में सबसे चिंताजनक स्थिति में है। इसलिए सरकार की अपने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर चिंता स्वाभाविक है। पर यह दावा करना मुश्किल है कि भारी जुर्माने से लोगों की मानमानियों पर रोक लगेगी और वाहन चलाने संबंधी आदतों में बदलाव आ सकता है।

पहले भी यातायात नियमों के उल्लंघन पर भारी जुर्माने और दंड का प्रावधान किया जा चुका है, पर उसका कोई उल्लेखनीय नतीजा सामने नहीं आया। न तो लोगों में सुरक्षित चलने की प्रवृत्ति विकसित हो पाई और न यातायात उल्लंघन की दर घटी, बल्कि सड़क हादसों में निरंतर बढ़ोतरी दर्ज हुई है। सभी जानते हैं कि बिना हेलमेट पहने, सीटबेल्ट बांधे, मोबाइल पर बात करते गाड़ी चलाना गंभीर मुसीबत की वजह बन सकता है। मगर लोगों में सतर्क न रहने की आदत बनती गई है, तो इसकी कुछ वजह यातायात पुलिस की लापरवाही भी है। अक्सर वह ऐसे दोषियों को किसी प्रभाव में आकर या कुछ रिश्वत लेकर छोड़ देती है। इस तरह लोगों में यह धारणा बैठ गई है कि अगर वे कोई गलती करेंगे, तो आसानी से बच निकलेंगे। इसलिए केवल दंड और जुर्माने के भय से लोगों में कानून तोड़ने की प्रवृत्ति को खत्म करने का दावा नहीं किया जा सकता। इसके लिए संबंधित महकमे को भी जवाबदेह बनाना जरूरी है।

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