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संपादकीय: उड़ान का संकट

कंपनी ने जिन विमानों को लीज पर लिया था, उनका किराया चुकाने तक के पैसे नहीं हैं। एक हजार से ज्यादा पायलटों और इंजीनियरों को कई महीने से वेतन नहीं मिल रहा है। इसलिए अब पायलटों ने एक अप्रैल से काम बंद करने की धमकी दे डाली है।

Author March 21, 2019 1:24 AM
सही मायनों में कहा जाए तो जेट एअरवेज फिलहाल एकदम कंगाली की हालत में है। ताजा हालात बता रहे हैं कि कंपनी के पास तीन-चार दिन के परिचालन के लिए ही पैसा बचा है।

भारत का विमानन क्षेत्र ऐसे वक्त में संकटों का सामना कर रहा है जब हवाई यात्रा करने वालों की संख्या में वृद्धि का दावा किया जा रहा है, कई शहरों के बीच उड़ान शुरू करने की तैयारी है और नए हवाई अड्डे बनाने की दिशा में काम चल रहा है। ऐसे में विमानन कंपनियों से हर कोई यह उम्मीद करता है कि वे और बेहतर सेवा प्रदान करें। लेकिन हकीकत में ऐसा हो नहीं रहा। ऊंचाइयां छूने के बजाय भारत की विमानन कंपनियां गर्त में जा रही हैं। कई विमानन कंपनियों की माली हालत बता रही है कि आने वाले दिन इनके लिए संकटपूर्ण हैं और हवाई यात्रा करने वालों के लिए निराशाजनक। ताजा उदाहरण निजी क्षेत्र की कंपनी जेट एअरवेज का है। यह कंपनी गहरे आर्थिक संकट में फंस चुकी है और इसके आधे से ज्यादा विमान खड़े हो गए हैं। एक सौ उन्नीस में से सिर्फ इकतालीस विमान उड़ान पर हैं। कंपनी ने जिन विमानों को लीज पर लिया था, उनका किराया चुकाने तक के पैसे नहीं हैं। एक हजार से ज्यादा पायलटों और इंजीनियरों को कई महीने से वेतन नहीं मिल रहा है। इसलिए अब पायलटों ने एक अप्रैल से काम बंद करने की धमकी दे डाली है। हालात इतने विकट हैं कि जेट एअरवेज और नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) के हाथ-पैर फूले पड़े हैं। समस्या का समाधान किसी को नजर नहीं आ रहा।

जेट एअरवेज का यह संकट विजय माल्या की कंपनी किंगफिशर की याद दिलाता है। किंगफिशर भी ऐसे ही संकट में फंसी थी और उसका क्या हश्र हुआ, किसी से छिपा नहीं है। किंगफिशर के बंद होने पर हजारों लोग बेरोजगार हो गए थे, कर्मचारियों को वेतन व अन्य बकाया का भुगतान तक नहीं हुआ और कंपनी पर बैंकों का नौ हजार करोड़ से ज्यादा कर्ज चढ़ गया। आज विजय माल्या पकड़ से बाहर है और बैंकों का पैसा मिल भी पाएगा या नहीं, कोई नहीं जानता। अब जेट एअरवेज भी इसी रास्ते पर है। इस कंपनी पर भी आठ हजार करोड़ से ज्यादा का कर्ज है, कर्मचारियों को वेतन नहीं मिल रहा, कंपनी बैंकों का कर्ज और लीज पर विमान देने वाली कंपनियों का पैसा नहीं चुका पा रही है। जेट में चौबीस फीसद हिस्सेदारी अबू धाबी की एतिहाद एअरलाइंस की है, लेकिन जेट एअरवेज की मदद के प्रस्ताव पर एतिहाद पीछे हट गई है।

ऐसे में सरकार के दबाव में बैंकों का समूह जेट में अपनी हिस्सेदारी खरीद कर मदद देता भी है तो यह बैंकों के लिए बड़ा जोखिम होगा। सवाल है कि जर्जर हो चुकी जेट को ऐसे बेलआउट से कितने दिन और आॅक्सीजन दी जा सकेगी!  जेट एअरवेज के मौजूदा संकट से विमान यात्री मुश्किल में हैं। आए दिन उड़ानें रद्द हो रही हैं। कंपनी न तो कोई वैकल्पिक सेवा मुहैया करवा रही है, न लोगों के पैसे लौटा रही है। इसमें बड़ी संख्या उन लोगों की भी है जिन्होंने कंपनी के विशेष पैकेज के तहत कई महीने पहले बुकिंग करा ली थी। लेकिन अब इन लोगों का पैसा नहीं लौटाया जा रहा। जेट के विमानों की सुरक्षा का मुद्दा भी चिंताजनक है। कहा जा रहा है कि ज्यादातर विमान सुरक्षा संबंधी मानकों को पूरा नहीं कर रहे। जेट और किंगफिशर के हालात बताते हैं कि भारत के विमानन क्षेत्र को भी वही रोग लग गया है, जिसके शिकार देश के ज्यादातर सार्वजनिक उपक्रम हो चुके हैं। स्पाइस जेट, एअर इंडिया और इंडिगो भी कोई स्वस्थ हालत में नहीं हैं। लगता है किंगफिशर की घटना से हमने कोई सबक नहीं सीखा। ऐसे में विमानन क्षेत्र कैसे ऊंची उड़ान भर पाएगा?

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