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हवा की सफाई

भले देर से ही सही, वायु प्रदूषण की मार झेल रहे शहरों को लेकर सरकार की आंखें तो खुलीं। देश के ज्यादातर शहरों में गंभीर वायु प्रदूषण से निपटने के लिए पर्यावरण मंत्रालय ने अब देशव्यापी योजना बनाई है। इसके तहत अगले पांच साल में एक सौ दो प्रदूषित शहरों की हवा को बीस से तीस फीसद तक साफ करने की बात है।

Author January 12, 2019 3:58 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (फाइल फोटो)

भले देर से ही सही, वायु प्रदूषण की मार झेल रहे शहरों को लेकर सरकार की आंखें तो खुलीं। देश के ज्यादातर शहरों में गंभीर वायु प्रदूषण से निपटने के लिए पर्यावरण मंत्रालय ने अब देशव्यापी योजना बनाई है। इसके तहत अगले पांच साल में एक सौ दो प्रदूषित शहरों की हवा को बीस से तीस फीसद तक साफ करने की बात है। नेशनल क्लीन एअर प्रोग्राम नाम की यह योजना कई चरणों में लागू की जाएगी। इस योजना के तहत राज्यों को आर्थिक मदद भी दी जाएगी, ताकि वायु प्रदूषण से निपटने के लिए जो काम किए जाने हैं, उनमें पैसे की कमी आड़े न आए। वायु प्रदूषण की वजह से देश की राजधानी दिल्ली सहित कई शहर तो जहरीली गैस के चैंबर बन चुके हैं। आए दिन नए-नए तथ्य और आंकड़े भयानक तस्वीर पेश कर रहे हैं। हालात इतने गंभीर हैं कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में तो हाल में दो दिन उद्योगों को बंद करने जैसा कदम उठाना पड़ गया। वैश्विक एजेंसियां प्रदूषित शहरों की जो सूची जारी कर रही हैं उनमें भारत और इसके शहर सबसे ऊपर हैं। सबसे ज्यादा हालत तो उत्तर प्रदेश के शहरों की खराब है। ऐसे में पर्यावरण मंत्रालय के इस कदम को एक अच्छी पहल के रूप में देखा जाना चाहिए और उम्मीद की जानी चाहिए कि इस दिशा में किए गए प्रयास फलीभूत होंगे।

लेकिन अब तक देखने में आया है कि प्रदूषण से निपटने के नाम पर सरकारें जो भी थोड़े-बहुत कदम उठाती आई हैं, वे बेअसर ही साबित हो रहे हैं। ऐसा इसलिए है कि हमारी सरकारों ने प्रदूषण को कभी भी समस्या के रूप में देखा ही नहीं। हालात बिगड़ते रहे और उन्हें नजरअंदाज किया जाता रहा। लेकिन जब पानी सर से गुजरने लगा, तब नींद खुली। आज भी ज्यादातर शहरों में कारखाने और छोटे-मझौले उद्योग जहरीला धुआं उगल रहे हैं, लेकिन कोई देखने वाला नहीं। ऐसा स्थानीय प्रशासन और कानून लागू करने वाली एजेंसियों की मिलीभगत के बिना तो संभव नहीं होता है। लेकिन जब पिछले पांच-सात साल से दिल्ली की हवा ज्यादा जहरीली हुई और हालात बेकाबू हो गए तब सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय हरित पंचाट ने सख्त कदम उठाए। उसके बाद से पर्यावरण मंत्रालय और प्रदूषण नियंत्रण करने वाले महकमे चेते हैं। आज भी ज्यादातर शहरों में वायु प्रदूषण को लेकर जनता, स्थानीय प्रशासन और सरकार में कोई चिंता नजर नहीं आती।

अगले पांच साल में वायु प्रदूषण को तीस फीसद तक नीचे लाने का जो लक्ष्य रखा गया है, उसे हासिल कर पाना एक बड़ी चुनौती है। इसकी वजह यह है कि एक तो पहले ही इस काम में काफी देर हो चुकी है, और फिर प्रदूषण बढ़ने की रफ्तार उठाए जाने वालों कदमों की तुलना में कई हजार गुना ज्यादा है। भारत में वायु प्रदूषण का एक बड़ा कारण ठोस परिवहन नीति का नहीं होना भी है। इस वजह से ज्यादातर शहरों में हजारों-लाखों की बड़ी संख्या में ऐसे पुराने वाहन दौड़ रहे हैं जिनकी अवधि खत्म हो चुकी है और इनमें भी डीजल वाहनों की तादाद ज्यादा है। ऐसे वाहनों में ट्रैक्टर, जुगाड़, पुरानी डीजल बसें, ट्रक और शहरों में आवाजाही के सबसे बड़े और सुलभ साधन टेंपो ज्यादा हैं। दिल्ली में कूड़े के बड़े-बड़े पहाड़ हवा को जहरीला बना रहे हैं। ऐसे में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए त्वरित और ठोस कदमों की जरूरत है। प्रदूषण से निपटने के लिए जन-भागीदारी भी बहुत जरूरी है। जब तक लोगों को जागरूक नहीं किया जाएगा, सरकार के प्रयास बेकार ही साबित होंगे।

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