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संपादकीय: आतंक के विरुद्ध

सच यह है कि विकास और शांति के लिए आतंकवाद आज सबसे बड़े खतरे के रूप में सामने है।

Author Published on: November 16, 2019 2:19 AM
आतंकवाद केवल भारत नहीं, अलग-अलग पैमानों पर दुनिया के कई देशों की समूची राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है।

पिछले कुछ सालों के दौरान यह साफ हो चुका है कि वैश्विक स्तर पर आर्थिक गतिविधियों के सहज संचालन और अलग-अलग देशों के विकास में आतंकवाद ने कैसी बाधाएं खड़ी की हैं। इसलिए आर्थिक सहयोग के लिए होने वाले तमाम अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में अगर आतंकवाद का सामना करने या उस पर काबू पाने को लेकर भी बातचीत केंद्र में होती है तो यह स्वाभाविक ही है। ब्राजील के ब्रासीलिया में गुरुवार को ग्यारहवें ब्रिक्स सम्मेलन में इस संगठन में शामिल देशों के बीच आपस में आर्थिक सहयोग के समांतर आतंकवाद भी चर्चा का विषय का बना है, तो इसकी वजह यही है। गौरतलब है कि ब्रिक्स सम्मेलन के पूर्ण सत्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि आतंकवाद से दुनिया की अर्थव्यवस्था को अब तक एक हजार अरब डॉलर का नुकसान हो चुका है। यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि विकास, शांति और समृद्धि के लिहाज से इतनी भारी रकम का क्या और कैसे इस्तेमाल हो सकता था, लेकिन आतंकी गतिविधियों की वजह से भारी नुकसान या फिर उसका सामना करने में खर्च की वजह से इतनी बड़ी राशि बर्बाद हो गई।

आतंकवाद केवल भारत नहीं, अलग-अलग पैमानों पर दुनिया के कई देशों की समूची राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। सच यह है कि विकास और शांति के लिए आतंकवाद आज सबसे बड़े खतरे के रूप में सामने है। इसके जगजाहिर होने के बावजूद दुनिया के कुछ देश न केवल इस समस्या की अनदेखी करते हैं, बल्कि परोक्ष रूप से आतंकी संगठनों के अपनी सीमा के भीतर से गतिविधियां संचालित करने को लेकर आंखें मूंदे भी रहते हैं। हालांकि भारत इस मसले पर अक्सर दुनिया को ध्यान दिलाता रहा है कि अगर इस प्रवृत्ति पर रोक नहीं लगाई गई तो आतंकी समूह वैश्विक अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान पहुंचाएंगे।

भारत को इस दिशा में एक बड़ी कामयाबी तब मिली थी जब चीन में हुए नौवें ब्रिक्स सम्मेलन में जारी घोषणा-पत्र में पहली बार पाकिस्तान की जमीन से आतंक फैलाने वाले संगठनों लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, तहरीक-ए-तालिबान, हक्कानी नेटवर्क आदि का नाम सार्वजनिक रूप से शामिल करते हुए इनकी आलोचना की गई थी। तब ब्रिक्स देशों ने आतंकवाद को शह देने वाले देशों को तीखी फटकार भी लगाई थी।

यानी ब्रिक्स देशों के ताजा सम्मेलन में एक हद तक सही, लेकिन भारत को आतंकवाद के मसले पर दुनिया का ध्यान खींचने में फिर अहम कामयाबी मिली है। खासतौर पर रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के साथ द्विपक्षीय बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने पर चर्चा की। इसका मुख्य उद्देश्य आतंकवाद निरोधक सहयोग के लिए एक व्यापक तंत्र बनाना है। रूस 2016 में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में भी आतंकवाद के मसले पर भारत का साथ दे चुका है।

इस बार दोनों नेताओं के बीच यह शिखर सम्मेलन इस लिहाज से भी महत्त्वपूर्ण रहा कि भारत-रूस संबंधों के साथ-साथ इसमें व्यापार, सुरक्षा और संस्कृति जैसे क्षेत्रों में व्यापक सहयोग पर भी बातचीत आगे बढ़ी। इस समूची कवायद में न केवल भारत, बल्कि विश्व स्तर पर अर्थव्यवस्था के बाधक तत्त्वों की पहचान और उसकी चुनौतियों का सामना करने की ठोस योजनाओं पर बातचीत आगे बढ़ी और यह अंतरराष्ट्रीय शांति और विकास के लिहाज से महत्त्वपूर्ण है। यों भी ब्रिक्स देशों के आर्थिक सहयोग की ओर बढ़ते कदमों में आतंकवाद जैसी समस्याओं से निपटने के लिए ठोस कार्यक्रम को शामिल करना वक्त की जरूरत है।

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