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संपादकीय: संरक्षणवाद के विरुद्ध

दरअसल, भारत और अमेरिका के बीच भी कारोबारी विवाद तब पैदा हुआ जब भारत ने हार्ले डेविडसन की मोटरसाइकिल पर आयात शुल्क पचास फीसद बढ़ाने की बात कही थी। इससे अमेरिका भड़क गया।

Author June 26, 2019 12:47 AM
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप।(Source: AP file Photo)

दो दिन बाद जापान के शहर ओसाका में जी-20 देशों की बैठक के मुद्दे और प्राथमिकताएं भले कुछ हों, लेकिन इतना तय है कि कारोबारी जंग के मसले पर अमेरिका के खिलाफ आवाज उठेगी। पिछले दो साल में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस तरह से संरक्षणवादी नीतियों की खुल कर पैरवी की है और अमेरिकी उद्योगों को बचाने के नाम पर चीन, भारत और यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के साथ जो कारोबारी रुख अपनाया है, वह चिंताजनक है। इसलिए इस बार बैठक से अलग इस मुद्दे पर भारत, रूस और चीन के बीच बात होगी और भविष्य की रणनीति का खाका तैयार हो सकता है। अमेरिका की संरक्षणवादी नीतियों का सबसे ज्यादा असर चीन पर पड़ रहा है। यों चीन भी ऐसी ही नीतियों को बढ़ावा देने में पीछे नहीं है। इसलिए असली कारोबारी जंग अमेरिका और चीन के बीच ही है। भारत और अमेरिका के बीच भी कई वस्तुओं पर शुल्क लगाने को लेकर तनातनी हुई है।

ज्यादातर देश अब महसूस कर रहे हैं कि वक्त रहते अमेरिकी संरक्षणवादी नीतियों का विरोध नहीं किया गया तो वैश्विक कारोबार पर अमेरिकी दादागीरी हावी हो जाएगी और दुनिया के कई देश इससे बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं और उनकी अर्थव्यवस्था को खतरा पैदा हो सकता है। चीन और अमेरिका के बीच व्यापार युद्ध की शुरुआत पिछले साल तब हुई थी जब अमेरिका ने चीन से आयात होने वाले इस्पात और अल्युमीनियम पर भारी आयात शुल्क लगा दिया था। इसकी प्रतिक्रिया में चीन ने भी अमेरिकी उत्पादों पर भारी आयात शुल्क लगा कर संदेश दिया कि वह कारोबारी जंग में पीछे नहीं हटेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति ने तब तर्क दिया था कि चीनी आयात के कारण अमेरिकी कारोबारियों को नुकसान हो रहा है और अमेरिका को पौने चार सौ अरब डॉलर सालाना का नुकसान उठाना पड़ रहा है, इसलिए इसकी भरपाई चीन से ही की जानी चाहिए। अमेरिका ने पड़ोसी देश कनाडा और यूरोपीय संघ के सहयोगी देशों को भी नहीं बख्शा। इन देशों पर भी व्यापार युद्ध की इस रणनीति के तहत आयात शुल्क थोपे गए। हालांकि बदले में उसे भी ऐसी ही कार्रवाई का सामना कर पड़ा। अब जी-20 के सदस्य देशों के सामने यह बड़ा सवाल है कि वे इस बैठक में अमेरिका की संरक्षणवादी नीति के खिलाफ कितनी ताकत से आवाज उठा पाते हैं। फिलहाल भारत, रूस और चीन ने अमेरिकाकी कारोबारी नीतियों के विरोध का फैसला कर लिया है।

दरअसल, भारत और अमेरिका के बीच भी कारोबारी विवाद तब पैदा हुआ जब भारत ने हार्ले डेविडसन की मोटरसाइकिल पर आयात शुल्क पचास फीसद बढ़ाने की बात कही थी। इससे अमेरिका भड़क गया और उसके बाद ही भारत से आयात होने वाले इस्पात और अल्युमीनियम पर भारी उत्पाद शुल्क लगा दिया। फिर जवाबी कार्रवाई में भारत ने भी अमेरिका से खरीदे जाने वाले उनतीस उत्पादों पर शुल्क लगा दिया। सवाल है कि अगर अमेरिका अगर अपने हितों को सर्वोपरि रखता है तो दूसरे देश कैसे अपने हितों से समझौता कर सकते हैं। अगर सारे ताकतवर देश इसी रास्ते पर चलने लगें तो इससे तो वैश्विक व्यापार संतुलन बिगड़ जाएगा और मंदी जैसे बड़े खतरे मंडराते रहेंगे। ट्रंप की निगाहें इस समय अगले राष्ट्रपति चुनाव पर हैं और फिर से राष्ट्रपति बनने के लिए वे तमाम ऐसे कदम उठाएंगे जिनसे अमेरिकी जनता के भीतर उनकी एक मजबूत राष्ट्रपति की छवि बने। ईरान के साथ युद्ध, चीन और अन्य देशों के साथ व्यापार युद्ध ऐसे ही कदम हैं। अब जी-20 की बैठक में अगर ट्रंप पर कोई दबाव बनता है तो यह संतुलन की दिशा में बड़ा कदम हो सकता है।

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