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संपादकीय: आगे का सफर

आज जब देश तकनीक और संसाधनों के स्तर पर ज्यादा बेहतर स्थिति में है, सुरक्षा-व्यवस्था पुख्ता की जा सकती है, उसमें चुनाव-प्रक्रिया को इतना लंबा खींचे बिना भी स्वच्छ मतदान सुनिश्चित कराने पर विचार जा सकता है।

Author May 21, 2019 1:04 AM
चुनाव आयोग फोटो सोर्स- जनसत्ता

रविवार को हुए मतदान के साथ सत्रहवीं लोकसभा के गठन के लिए आम चुनावों का आखिरी चरण पूरा हो गया। अब चुनाव आयोग की ओर से आधिकारिक तौर पर नतीजों की अंतिम घोषणा के पहले तक कयासों का दौर चलेगा। दरअसल, हर चुनाव के बाद जिस तरह समूचे देश में भावी सरकार को लेकर लोगों के बीच उत्सुकता देखी जाती है, उसके मुताबिक स्वाभाविक ही कई तरह के आकलन पेश किए जा रहे हैं। लेकिन आने वाली सरकार की कमान किस दल या गठबंधन के हाथ में आती है, उसका क्या स्वरूप होता है, यह तेईस मई के बाद ही साफ होगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि निष्पक्ष और स्वच्छ मतदान सुनिश्चित करने के लिए चुनाव आयोग को यह अधिकार है कि वह इसके मुताबिक व्यवस्था करे। असली मकसद अगर लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करना और चुनाव-प्रक्रिया को विवादरहित बनाना है तो इसके लिए हर जरूरी इंतजाम किए जाने चाहिए। इस लिहाज से कुछ राजनीतिक पार्टियों की ओर से छोटी-मोटी शिकायतों को छोड़ दिया जाए तो चुनाव आयोग ने कामयाबी के साथ चुनाव संपन्न कराए। लेकिन एक लंबी और थकाऊ चुनाव प्रक्रिया ने विचार के कई पहलू छोड़े हैं।

सवाल यह है कि करीब डेढ़ महीने और सात चरणों में चली इस प्रक्रिया को क्या इससे कम अवधि में नहीं निपटाया जा सकता था! विपक्ष सहित मौजूदा सत्ताधारी पार्टी के कुछ सहयोगी दलों ने भी राय जाहिर की है कि चुनाव प्रक्रिया को इतना लंबा खींचने से बचा सकता है। इतने अधिक चरणों में मतदान कराने के पीछे एक बड़ा कारण यह रहा है कि इससे देश के अलग-अलग हिस्सों में होने वाली चुनावी हिंसा की घटनाओं की आशंका को खत्म किया जा सकेगा। सच है कि एक दौर में देश में होने वाले चुनाव रक्तरंजित रहे हैं और हमारे लोकतंत्र के लिए वह एक बेहद अफसोसनाक स्थिति थी। उस तस्वीर से बाहर लाने में राजनीतिक दलों की भूमिका है, लेकिन यह जिम्मेदारी मुख्य रूप से चुनाव आयोग की है, जिसे उसने कमोबेश पूरा किया। लेकिन देश के कुछ हिस्सों से छिटपुट हिंसा की खबरों के अलावा खासतौर पर पश्चिम बंगाल से अमूमन हर चरण के मतदान के बीच जिस तरह की हिंसा की खबरें सामने आर्इं, उनसे साफ है कि चुनावों को लंबा खींच कर इस समस्या से पूरी तरह नहीं निपटा जा सकता है।

आज जब देश तकनीक और संसाधनों के स्तर पर ज्यादा बेहतर स्थिति में है, सुरक्षा-व्यवस्था पुख्ता की जा सकती है, उसमें चुनाव-प्रक्रिया को इतना लंबा खींचे बिना भी स्वच्छ मतदान सुनिश्चित कराने पर विचार जा सकता है। इसके अलावा, पिछले लोकसभा चुनाव के मुकाबले मतदान-प्रतिशत में कोई खास सकारात्मक बदलाव देखने को नहीं मिला तो इसका एक बड़ा कारण पूरे चुनाव के दौरान मौसम का मिजाज भी रहा। तेज गरमी की वजह से बहुत सारे ऐसे मतदाताओं का उत्साह ठंडा रहा, जो मौसम में नरमी की स्थिति में शायद वोट देने जाते। शायद यही वजह है कि चुनाव फरवरी या फिर नवंबर में आयोजित कराने की मांग उठी है। हालांकि देश भर में सामाजिक और भौगोलिक जटिलताओं के बीच भी आमतौर पर लोगों ने जो उत्साह दिखाया, खासतौर पर महिला मतदाताओं के प्रतिशत में जो बढ़ोतरी देखी गई, उसे और मजबूत करने की जरूरत है। चुनाव कराने पर होने वाले खर्च से लेकर राजनीतिक दलों की ओर से अपने प्रचार के मद में बहाई गई राशि भी ऐसा सवाल है जिस पर चुनाव आयोग और देश के राजनीतिक दलों को सोचना होगा। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि भावनात्मक मुद्दों के बजाय अगर देश और समाज के वास्तविक विकास को लक्षित सवालों पर जनता का मत लिया जाए तो यही हमारे लोकतंत्र के लिए जीवन-तत्त्व बनेगा।

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