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खतरे की खदान

मेघालय की एक कोयला खदान में पिछले तेरह दिसंबर से फंसे पंद्रह मजदूरों के मामले में राज्य और केंद्र सरकार के रवैए से साफ है कि उनकी प्राथमिकताओं में हाशिये के लोगों की जगह क्या है! बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने स्वाभाविक ही राज्य सरकार को इस मामले में कड़ी फटकार लगाई और केंद्र सरकार को भी तलब किया।

Author January 4, 2019 4:09 AM
मेघालय की कोयला खदान में पिछले तेरह दिसंबर से फंसे 15 मजदूर फंसे हुए हैं।(सोर्स: Reuters)

मेघालय की एक कोयला खदान में पिछले तेरह दिसंबर से फंसे पंद्रह मजदूरों के मामले में राज्य और केंद्र सरकार के रवैए से साफ है कि उनकी प्राथमिकताओं में हाशिये के लोगों की जगह क्या है! बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने स्वाभाविक ही राज्य सरकार को इस मामले में कड़ी फटकार लगाई और केंद्र सरकार को भी तलब किया। अदालत ने बचाव के कदमों पर सवाल उठाए और पूछा कि यह मामला गंभीर और चिंताजनक है; मजदूरों को खदान में फंसे कितने दिन हो गए और ऐसा लगता है कि केंद्र, राज्य और एजेंसियों के बीच कोई समन्वय नहीं है। अदालत ने निर्देश दिया कि उन्हें किसी भी स्थिति में बाहर निकाला जाना चाहिए और जरूरत पड़े तो सेना को बुलाया जाए। अव्वल तो लंबे समय से वह कोयला खदान अवैध रूप से चलाई जा रही थी, लेकिन उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। दूसरे, जब खतरनाक हालात में काम करने वाले पंद्रह मजदूर उसके भीतर फंस गए तब भी प्रशासनिक तंत्र को वक्त पर सक्रिय होना जरूरी नहीं लगा।

सवाल है कि घटना के बाद बचाव कार्य में ऐसी लापरवाही क्यों बरती गई! कुछ समय पहले जब थाइलैंड की एक गुफा में बच्चे फंस गए थे तो वहां तेजी से पानी निकालने वाले हाइपावर पंप भेजने को लेकर भारत ने तुरंत सक्रियता दिखाई गई थी। लेकिन यहां पिछले बीस दिन से खदान में पानी भरने की वजह से मजदूरों के फंसे होने के बावजूद सरकार को तुरंत कोई पहल करना जरूरी नहीं लगा। अदालत ने ठीक सवाल उठाया है कि जब थाईलैंड में हाइपावर पंप भेजे जा सकते हैं, तो यहां क्यों नहीं! गौरतलब है कि मेघालय के जयंतिया हिल्स में पूरी तरह पेड़ों से ढंकी एक पहाड़ी पर वह खदान है, जिसमें किसी भी तरह के खनन पर राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने 2014 में ही पाबंदी लगा दी थी। किसी तरह ‘रैट होल’ यानी चूहे के बिल की तरह दिखने वाली बेहद संकरी सुरंगों से होकर मजदूरों को खदान में भीतर घुसना और वहां से कोयला निकाल कर लाना पड़ता है। जाहिर है कि इस तथ्य से सभी वाकिफ हैं कि उन खदानों के भीतर जाना हर वक्त जानलेवा साबित होने के खतरे के बीच होता था।

सवाल है कि इसके बाद आखिर किन वजहों से किसी कोयला खदान के संचालकों को गैरकानूनी रूप से उसमें मजदूरों को भेजने और खनन की इजाजत मिली हुई थी। हर चप्पे की खोज-खबर रखने वाले प्रशासन की नजर वहां होने वाली रोजाना की अवैध गतिविधियों पर क्यों नहीं पड़ी? अगर सब कुछ उसकी जानकारी में हो रहा था तो क्या इस आपराधिक गतिविधि में खुद स्थानीय प्रशासन भी शामिल है? आखिर चार सालों से वहां गैरकानूनी रूप से जो चल रहा था, वह किसकी देखरेख और मालिकाने में चल रहा था और प्रशासन की ओर से उसकी अनदेखी की क्या वजह थी? ताजा त्रासदी में लापरवाही या ढीला-ढाला रुख क्या इसलिए दर्शाया गया कि खदान में फंसे मजदूर पहले ही अभावों के मारे लाचार हालात में जी रहे थे और उनके पीछे कोई बड़ी ताकत नहीं है जो उनके अधिकारों की लड़ाई लड़ पाती? अब बीस दिन बाद उन मजदूरों के खदान के भीतर जिंदा बचे होने की उम्मीद बेहद क्षीण है और अगर किन्हीं स्थितियों में इस तरह की दुखद खबर ही आखिर सच साबित होती है, तो क्या इसके लिए सरकार और व्यवस्था को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए!

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