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संपादकीय: हादसों के ठिकाने

औद्योगिक हादसों के दुष्परिणाम केवल कुछ लोगों की जान चली जाने तक सीमित नहीं होते। कई बार उनके बुरे प्रभाव बरसों तक बने रहते हैं। रासायनिक गैसों के रिसाव से होने वाले हादसे कारखानों से बाहरे बसे लोगों की भी सेहत पर बहुत बुरा प्रभाव डालते हैं। म

Author Published on: September 5, 2019 1:02 AM
आग में करीब पंद्रह लोगों की मौत हो गई।

औद्योगिक हादसों पर काबू पाने और कारखानों में काम करने वाले लोगों की सुरक्षा के पुख्ता उपाय करने की जरूरत लंबे समय से रेखांकित की जाती रही है मगर इस दिशा में अपेक्षित ध्यान अब तक नहीं दिया गया है। यही वजह है कि जब-तब कारखानों में आग लगने, रसायन और गैस आदि के रिसाव से बड़े हादसे हो जाते हैं। पिछले पांच दिनों में देश के विभिन्न हिस्सों में ऐसे तीन बड़े हादसे हो गए। महाराष्ट्र के धुले में एक रसायन कारखाने में रसायन के रिसाव से लगी आग में करीब पंद्रह लोगों की मौत हो गई। फिर देश की सबसे बड़ी तेल और प्राकृतिक गैस कंपनी ओएनजीसी की मुंबई इकाई में भीषण आग लग गई, जिसमें कई लोगों की जान चली गई। अभी ओएनजीसी की आग शांत भी नहीं पड़ी थी कि पंजाब में अमृतसर के पास एक पटाखा फैक्ट्री में आग लग गई, जिसमें करीब 18 लोगों के मारे जाने की खबर है। करीब पांच महीने पहले भी अमृतसर के पास इसी तरह एक पटाखा फैक्ट्री में आग लगी थी, जिसमें कई लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। हैरानी की बात है कि ऐसे हादसों से न तो कारखाना मालिक कोई सबक लेते हैं और न सरकारी महकमे सुरक्षा नियमों की अनदेखी पर कड़े कदम उठाना जरूरी समझते हैं।

छोटी औद्योगिक इकाइयां चूंकि कम पूंजी से लगाई और चलाई जाती हैं, उनमें आमतौर पर भवन निर्माण और सुरक्षा संबंधी उपायों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। वे आग, रसायन और गैस आदि के रिसाव की स्थिति से बचने के लिए सुरक्षा उपकरणों आदि पर खर्च करने से बचती देखी जाती हैं। उनकी नियम-कायदों की अनदेखी में सरकारी महकमों के संबंधित अधिकारी भी मदद करते हैं। मगर ओएनजीसी जैसी बड़ी और सुव्यवस्थित इकाइयों में भी ऐसी घटनाएं हो जाती हैं, तो औद्योगिक सुरक्षा को लेकर स्वाभाविक रूप से सवाल गहरे होते हैं। ऐसे ही हादसों को देखते हुए परमाणु बिजलीघरों का विरोध होता रहा है कि अगर कभी किसी चूक से उनमें हादसे हुए तो महा विनाश हो सकता है। भारत में औद्योगिक हादसे का अब तक का सबसे बड़ा उदाहरण भोपाल गैस कांड है, जिसके नतीजे बरसों लोगों को भुगतने पड़े। इसलिए औद्योगिक सुरक्षा पर विशेष बल दिया जाता रहा है। मगर आज जब तमाम चीजें कंप्यूटर और अत्याधुनिक सूचना प्रणाली से संचालित होने लगी हैं, हैरानी की बात है कि समय रहते ओएनजीसी जैसे हादसों पर काबू पाना संभव नहीं हो पाया है।

औद्योगिक हादसों के दुष्परिणाम केवल कुछ लोगों की जान चली जाने तक सीमित नहीं होते। कई बार उनके बुरे प्रभाव बरसों तक बने रहते हैं। रासायनिक गैसों के रिसाव से होने वाले हादसे कारखानों से बाहरे बसे लोगों की भी सेहत पर बहुत बुरा प्रभाव डालते हैं। मगर हालत यह है कि बहुत सारी छोटी औद्योगिक इकाइयां अपने यहां काम करने वाले लोगों को जरूरी दस्ताने, हेलमेट, मास्क आदि उपलब्ध नहीं करातीं। वे हादसों से रोकथाम संबंधी उपकरण पर कितना ध्यान दे पाती होंगी, अंदाजा लगाया जा सकता है। पटाखा बनाने वाले कारखानों में बड़ी संख्या में बच्चे काम करते हैं। उनकी सांसों में गंधक घुलती रहती है और वे फेफड़े आदि संबंधी बीमारियों की गिरफ्त में आ जाते हैं। फिर आग से उनकी जान का जोखिम सदा बना रहता है। जब तक औद्योगिक सुरक्षा पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया जाएगा, ऐसे हादसों पर काबू पाना चुनौती बना रहेगा।

 

 

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