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संपादकीय: अशांति की घाटी

गुरुवार को डोडा जिले के भद्रवाह में एक घटना ने सांप्रदायिक हिंसा का रूप ले लिया। यह इलाका वैसे भी सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील है। लेकिन यह जानते हुए भी प्रशासन हिंसा को रोक नहीं पाया।

Author May 18, 2019 2:40 AM
जम्मू-कश्मीर के भदरवाह में लगे कर्फ्यू के दौरान की तस्वीर। (फोटोः मंसूर कादिर)

जम्मू-कश्मीर में पिछले कुछ दिनों में हालात जिस कदर बिगड़े हैं, वे चिंता पैदा करने वाले हैं। इस साल फरवरी में पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर बड़े आतंकी हमले के बाद लगा था कि अब तो सरकार की आंखें खुली होंगी और आने वाले दिनों में कुछ ऐसे कदम उठेंगे जिनसे राज्य में हालात सामान्य बनने में मदद मिले। पुलवामा के इस आतंकी हमले में सीआरपीएफ के चौवालीस जवान मारे गए थे। तब सरकार ने राज्य में आतंकियों के खिलाफ बड़ा अभियान छेड़ने की बात कही थी। लेकिन पिछले एक हफ्ते में राज्य के अलग-अलग हिस्सों से जिस तरह की घटनाएं सामने आई हैं, उनसे तो लग रहा है कि प्रदेश में सरकारी तंत्र एक तरह से नाकाम ही है। पहले तो उत्तर कश्मीर के बांदीपोरा में बच्ची से बलात्कार की घटना हुई और फिर इसके विरोध में घाटी में प्रदर्शन और हिंसा हुई। इसके बाद भद्रवाह में एक व्यक्ति की हत्या हो गई और हिंसा भड़क उठी। घाटी में आए दिन जगह-जगह आतंकवादियों और सुरक्षाबलों में मुठभेड़ें चल रही हैं। जाहिर है, आतंकी नेटवर्क पूरी तरह सक्रिय है और सुरक्षाबलों को छका रहा है। ऐसा लगता है कि घाटी में हालात बेकाबू हैं और सरकार और प्रशासन को कोई उपाय नहीं सूझ रहा है।

गुरुवार को डोडा जिले के भद्रवाह में एक घटना ने सांप्रदायिक हिंसा का रूप ले लिया। यह इलाका वैसे भी सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील है। लेकिन यह जानते हुए भी प्रशासन हिंसा को रोक नहीं पाया। गुरुवार तड़के कुछ लोगों ने एक व्यक्ति को गो-तस्कर होने का आरोप लगाते हुए गोली मार दी थी। इसके बाद हालात बिगड़ते चले गए। पुलिस थाने पर हमले की घटना के बाद कस्बे में सेना तैनात करनी पड़ी, कर्फ्यू लगाया गया और इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई। सवाल है कि घाटी में सुरक्षा कड़ी होने के बावजूद इस तरह की घटनाएं आखिर हो कैसे रही हैं! अगर इलाका सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील है तो स्थानीय पुलिस प्रशासन को चौकस रहना चाहिए था। लेकिन प्रशासन की नींद तब टूटी जब हालात हाथ से निकल गए। घाटी में बच्चियों से बलात्कार की घटना के बाद भड़की हिंसा भी स्थानीय प्रशासन की नाकामी का परिचायक है। राज्य में इस वक्त राष्ट्रपति शासन है। ऐसे में स्थानीय प्रशासन से ज्यादा चुस्त और सख्त होने की उम्मीद की जाती है। लेकिन हकीकत में ऐसा दिख नहीं रहा है।

इस तरह की घटनाओं के अलावा घाटी में आतंकी संगठनों की गतिविधियां जारी हैं। पुलवामा और शोपियां में आतंकियों और सुरक्षाबलों के बीच मुठभेड़ में जैश-ए-मोहम्मद के पांच आतंकियों का मारा जाना सुरक्षाबलों की उपलब्धि तो है, लेकिन चिंता का विषय यह है कि सेना और सुरक्षाबलों के लगातार अभियान के बावजूद घाटी में इन आतंकी संगठनों के हौसले पस्त नहीं हो रहे। घाटी के जिलों में खासतौर से ग्रामीण इलाकों में आतंकी संगठनों की गहरी पैठ है और इसीलिए सेना व सुरक्षाबलों के लिए इनका खात्मा बड़ी चुनौती बना हुआ है। घाटी में सीमा पार से आतंकियों की घुसपैठ रुक नहीं पाई है। किसी न किसी रास्ते आतंकी भारत में प्रवेश कर ही रहे हैं। हालांकि सुरक्षाबलों के लगातार अभियान से आतंकियों पर दबाव तो बना है और उनकी बढ़ती गतिविधियां इसी की छटपटाहट का नतीजा मानी जा रही हैं। कुल मिलाकर घाटी के आज जो हालात हैं वे पहले से कहीं ज्यादा विकट हैं। आतंकियों के सफाए के अलावा सरकार के पास ऐसी कोई योजना नजर नहीं आती जिससे स्थानीय लोगों में सरकार के प्रति भरोसा पैदा हो सके और वे आंतकी संगठनों के चंगुल से मुक्त हो सकें। घाटी के हालात सरकार की अदूरदर्शिता को बताने के लिए काफी हैं।

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