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संपादकीय: जाधव का हक

कुलभूषण जाधव कोई अपराधी नहीं हैं। वे भारतीय नौसेना के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और कारोबार के लिए ईरान गए थे।

जाधव को पकड़ने के बाद यह पहला मौका है जब किसी भारतीय राजनयिक को उनसे मिलने की इजाजत दी गई है।

पाकिस्तान सरकार को आखिरकार कुलभूषण जाधव को राजनयिक पहुंच उपलब्ध कराने के लिए मजबूर होना ही पड़ा। बेहतर होता कि पाकिस्तान वियना संधि का सम्मान और पालन सम्मान करता और पहले ही कुलभूषण जाधव को राजनयिक पहुंच सहित वे सभी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराता जिनके वे कानूनी तौर पर हकदार हैं। लेकिन उसने ऐसा नहीं करके वियना संधि को ठेंगा दिखाया और जाधव के मानवाधिकारों का हनन जारी रखा। इसी साल सत्रह जुलाई को हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय अदालत (आइसीजे) का भारत के पक्ष में फैसला आने और उसके बाद बने भारी दबाव की वजह से ही पाकिस्तान को कुलभूषण जाधव मामले में घुटने टेकने पड़े। आइसीजे ने फैसले में साफ कहा कि पाकिस्तान जाधव की मौत की सजा पर फिर से विचार करे और उन्हें राजनयिक पहुंच उपलब्ध कराए। इसके बाद पाकिस्तान के पास अपने बचाव का कोई रास्ता नहीं रह गया था। पिछले महीने उसने जाधव को राजनयिक पहुंच मुहैया कराने की सशर्त पेशकश की थी, जिसे भारत ने ठुकरा दिया था।

जाधव को जासूसी और आतंकवाद के आरोप में 2016 में हिरासत में लिया गया था और फिर उन पर विशेष सैन्य अदालत में मुकदमा चला कर अप्रैल 2017 में मौत की सजा सुना दी थी। इसके बाद ही भारत ने पाकिस्तान के इस फैसले को अंतरराष्ट्रीय अदालत में चुनौती दी थी। जाधव को पकड़ने के बाद यह पहला मौका है जब किसी भारतीय राजनयिक को उनसे मिलने की इजाजत दी गई है।

कुलभूषण जाधव कोई अपराधी नहीं हैं। वे भारतीय नौसेना के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और कारोबार के लिए ईरान गए थे। लेकिन चाबहार के पास से उन्हें पाकिस्तानी खुफिया एजेंटों ने पकड़ लिया था और पाकिस्तान ने उन्हें आतंकवादी करार दे डाला। उन्हें पाकिस्तान स्थित भारतीय उच्चायोग के किसी भी अधिकारी से कोई मुलाकात नहीं करने दी गई। न ही मुकदमे के दौरान उन्हें कोई कानूनी मदद दी गई। सैन्य अदालत ने एकतरफा सुनवाई करते हुए मौत की सजा सुना दी। जब भारत इस मामले को आइसीजे में ले गया था तभी साफ हो गया था कि भारत का पक्ष काफी मजबूत है और इस मामले में पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ेगी।

अंतरराष्ट्रीय अदालत ने जिस भारी बहुमत के साथ भारत के पक्ष में फैसला सुनाया उसी से पाकिस्तान की पोल खुल गई। एक कैदी के रूप में जाधव को जो बुनियादी अधिकार मिलने चाहिए उन्हें उनसे वंचित रखा गया था। दिसंबर 2017 में पहली बार जाधव को उनकी पत्नी और मां से कुछ ही देर के लिए मिलवाया गया था लेकिन वह ‘मुलाकात’ जाधव और उनके परिवार के लिए यातना भरी रही थी। इसीलिए बार-बार इस बात को लेकर सवाल उठ रहा था कि राजनयिक पहुंच किस तरह से उपलब्ध कराई जाएगी।

जाधव का मामला कोई पहला नहीं है। पाकिस्तान ने ऐसे ही कई भारतीयों को जासूसी, बम विस्फोट, आतंकवाद के आरोप में वर्षों से जेलों में बंद कर रखा है। उन्हें घोर शारीरिक और मानसिक यातनाएं दी जाती हैं। सरबजीत का मामला कोई भी भूला नहीं है। अभी भारत और पाकिस्तान के रिश्ते तनावपूर्ण चल रहे हैं। पाकिस्तान ने भारत के उच्चायुक्त को वापस भेज दिया है और अपने उच्चायुक्त को भी बुला लिया। ऐसे माहौल में वह जाधव को राजनयिक पहुंच मुहैया करा कर यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि वह आइसीजे के फैसले को मान रहा है और संबंध सुधारने की दिशा में इसे एक पहल के रूप में देखा जाना चाहिए। लेकिन दुनिया जान रही है कि पाकिस्तान की मंशा और मजबूरी क्या है।

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