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संपादकीय: विवाद के सदन

सुप्रीम कोर्ट ने भी विधानसभा अध्यक्ष की शक्तियों पर फिर से विचार का सुझाव दिया कि यह ध्यान रखने की जरूरत है कि अध्यक्ष खुद किसी राजनीतिक दल से आते हैं।

Author नई दिल्ली | Updated: January 23, 2020 12:51 AM
अदालत ने अयोग्य ठहराने की मांग करने वाली याचिकाओं को देखने के लिए संसद को सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र प्रणाली बनाने का सुझाव दिया है।

देश के अलग-अलग राज्यों की विधानसभाओं में अक्सर इस तरह के विवाद उठते रहते हैं कि सदस्यों के आचरण या फैसलों को लेकर सदन के अध्यक्ष ने जो व्यवस्था दी, वह कितनी न्यायसंगत है! सदन में भागीदारी करने वाले दलों की ओर से ऐसे आरोप आम हैं कि चूंकि विधानसभा के अध्यक्ष किसी खास पार्टी के सदस्य के रूप में हैं, इसलिए उनका फैसला इससे प्रभावित होता है। ऐसी शिकायतें आमतौर पर किसी विधायक के किन्हीं कारणों से अयोग्य ठहराने के मामलों में आती हैं और बात अदालतों तक भी पहुंचती है। ऐसे में विधानसभा अध्यक्ष को मिली विधायी शक्तियां बहस के घेरे में आती हैं। हालांकि आम धारणा यही है कि सदन के अध्यक्ष को किसी खास दल के प्रति पक्षपात से बचना होता है और कोई भी व्यवस्था देते हुए पूरी तरह निष्पक्ष दिखना भी होता है। इस संदर्भ में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम राय सामने रखी है जो राज्यों की विधानसभाओं में समय-समय पर खड़ी होने वाली ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए एक जरूरी सलाह मानी जा सकती है। अदालत ने अयोग्य ठहराने की मांग करने वाली याचिकाओं को देखने के लिए संसद को सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र प्रणाली बनाने का सुझाव दिया है।

दरअसल, अदालत के सामने मामला मणिपुर विधानसभा का था, जहां वन मंत्री और अब भाजपा विधायक ने विधानसभा चुनाव कांग्रेस के टिकट पर जीता था, लेकिन बाद में उन्होंने पार्टी बदल ली थी। ऐसे में स्वाभाविक रूप से कांग्रेस ने उन्हें अयोग्य ठहराने की मांग की थी। लेकिन ऐसी स्थिति में इस तरह की शिकायतें रही हैं कि विधानसभा के अध्यक्ष चूंकि आमतौर पर सत्ताधारी दल के होते हैं, इसलिए वे अयोग्यता का आधार होने के बावजूद फैसला लेने में देरी करते हैं या फिर इस मसले पर उनकी व्यवस्था पर विवाद खड़ा होता है।

इसी के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने भी विधानसभा अध्यक्ष की शक्तियों पर फिर से विचार का सुझाव दिया कि यह ध्यान रखने की जरूरत है कि अध्यक्ष खुद किसी राजनीतिक दल से आते हैं। जाहिर है, अदालत का इशारा इस ओर है कि सत्ताधारी खेमे में होने की महत्त्वाकांक्षा में विधानसभा में अलग-अलग पार्टियों के सदस्यों के दल-बदल की स्थिति में अगर विधानसभा अध्यक्ष की ओर से दी गई व्यवस्था अपने राजनीतिक दल के प्रति निष्ठा से जुड़ी होगी तो उस पर सवाल उठेंगे। ऐसी स्थिति से बचने के लिए ही शायद अदालत ने कहा कि संसद को इस पर फिर से विचार करना चाहिए कि अयोग्यता संबंधी याचिकाओं पर फैसला अध्यक्ष द्वारा लिया जाना चाहिए या नहीं।

यों सरकार में मंत्री बनने या कोई अन्य आकर्षक पद पाने की महत्त्वाकांक्षा में दल-बदल के मामले कोई हैरानी की बात नहीं है। इसका तर्क यह है कि किसी सदस्य को अपनी राय बदलने का अधिकार है। लेकिन लोकतांत्रिक हक की धारणा से मिलने वाली सुविधा से कई बार समस्याएं खड़ी होती रही हैं। ऐसे अनेक मौके सामने आते रहे हैं जब किसी राज्य में कुछ विधायक अपनी निष्ठा बदल लेते हैं और इससे कई बार सरकारें तक बदल जाती है। जब ऐसे विधायकों को अयोग्य ठहराने की मांग की जाती है तो यह आमतौर पर विधानसभा के अध्यक्ष के फैसले पर निर्भर करता है। ऐसे में अगर विधानसभा अध्यक्ष के फैसले अपनी राजनीतिक निष्ठा से संचालित होते हैं तो उस पर सवाल उठते हैं। इसलिए अगर इससे इतर कोई नई और स्वतंत्र व्यवस्था कायम की जाती है तो यह उचित ही होगा। लेकिन यह ध्यान रखने की जरूरत होगी कि मौजूदा व्यवस्था में जिस निरपेक्षता और ईमानदार फैसले की उम्मीद में जो नई प्रणाली बनाई जाए, वह कसौटी पर खरी उतरे।

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