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संपादकीय: उत्पीड़न का पाठ

यह समझना मुश्किल है कि जिस शिक्षक ने बच्ची के साथ ऐसे बर्ताव में कक्षा के बाकी बच्चों तक को शामिल किया, उसके सोचने-समझने और उसकी मानसिक स्थिति का स्तर क्या होगा और वह किस तरह स्कूल में शिक्षक जैसे जिम्मेदार पद का निर्वाह कर रहा था?

Author May 17, 2019 12:58 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

यह सिहरा देने वाली बात है कि स्कूल में पढ़ने वाली किसी बच्ची को सिर्फ इसलिए उसके सहपाठियों से छह दिनों तक लगातार थप्पड़ लगवाया जाए कि उसने होमवर्क नहीं किया था। ऐसे शिक्षक की क्षमता और मनोदशा का अंदाजा लगाया जा सकता है, जिसने कक्षा के सभी बच्चों को पीड़ित बच्ची को थप्पड़ मारने का आदेश दिया था। इस मामले में संतोष बस इतने से किया जा सकता है कि एक स्थानीय अदालत ने अब उस शिक्षक को आखिरकार जेल भेज दिया है। यह एक तरह से बड़ा सबक है कि स्कूली बच्चों के साथ शिक्षकों को अपने बर्ताव की सीमा समझनी चाहिए। यह मामला पिछले साल ग्यारह जनवरी को सामने आया था, जिसमें छठी कक्षा में पढ़ने वाली एक बच्ची अपनी बीमारी की वजह से दस दिनों तक स्कूल नहीं जा पाई और इस वजह से उसका होमवर्क पूरा नहीं हो पाया था। सिर्फ इतने के लिए एक शिक्षक ने छात्रा को उसके ही सहपाठियों से दोनों गालों पर लगातार छह दिन तक एक सौ अड़सठ थप्पड़ लगवा कर प्रताड़ित किया।

यह समझना मुश्किल है कि जिस शिक्षक ने बच्ची के साथ ऐसे बर्ताव में कक्षा के बाकी बच्चों तक को शामिल किया, उसके सोचने-समझने और उसकी मानसिक स्थिति का स्तर क्या होगा और वह किस तरह स्कूल में शिक्षक जैसे जिम्मेदार पद का निर्वाह कर रहा था? एक व्यक्ति की पृष्ठभूमि से उपजी कुंठा और उसके व्यवहार में घुली सामंती मानसिकता उसकी निजी समस्या हो सकती है। इसके लिए उसे अपने स्तर पर निपटने की जरूरत है। लेकिन अगर इसकी वजह से वह स्कूल में किसी बच्ची को होमवर्क अधूरा करने जैसे बेहद मामूली कारण से इतनी तकलीफदेह सजा देता है तो उसकी योग्यता संदिग्ध है। छोटे बच्चों का मन-मस्तिष्क पहले ही बेहद कोमल होता है। तिस पर समूची कक्षा के बच्चों के सामने और उनके जरिए ही शारीरिक यातना दिलाए जाने के बाद उसे भावनात्मक स्तर पर कितनी गहरी चोट पहुंची होगी, इसका सिर्फ अंदाजा लगाया जा सकता है।

मनोवैज्ञानिक लिहाज से देखें तो कई बार इस तरह की घटनाओं से बच्चों के मन पर गहरी चोट लगती है और बहुत बाद के दिनों में भी उनके समूचे व्यक्तित्व पर इसका नकारात्मक असर कायम रहता है। अफसोस की बात यह है कि इस मसले पर शिक्षाविदों से लेकर मनोवैज्ञानिक दृष्टि से सोचने-समझने वाले विशेषज्ञों तक ने एक स्वर में कहा है कि स्कूली बच्चों को किसी भी तरह की हल्की या सख्त सजा नहीं दी जाए। इस मामले में काफी पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किया था। लेकिन आज भी बहुत सारे शिक्षक कानून को तो धता बताते ही हैं, वे पुरानी और बेमानी मान्यताओं के आधार पर यह मान कर चलते हैं कि दंड या पिटाई स्कूली शिक्षा का अभिन्न अंग हैं। यह एक पिछड़ी सोच है, जिसका बहुत बड़ा खमियाजा हमारे समूचे समाज को उठाना पड़ा है। स्कूलों या घर में इस तरह की यातना या उत्पीड़न के दौर से गुजरने वाले बच्चे बाद में खंडित व्यक्तित्व का शिकार हो जाते हैं और उसी तरह का व्यवहार दूसरों के साथ होने को सही ठहराते हैं। जरूरत इस बात की है कि बच्चों की भावनात्मक बुनावट और मनोविज्ञान को समझ कर उनकी पढ़ाई और उनके साथ होने वाले व्यवहारों का पैमाना तय किया जाए, ताकि शिक्षा और व्यक्तित्व की कसौटी पर हम एक बेहतर और इंसानी मूल्यों से लैस पीढ़ी का निर्माण कर सकें।

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