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संपादकीय: बदहाली के स्कूल

यह स्थिति तब है जब पिछले करीब ढाई-तीन दशकों से सरकारी स्कूलों में बुनियादी ढांचा मजबूत करने और इस तरह शिक्षा की सूरत में सुधार लाने के वादे और दावे लगातार किए जा रहे हैं।

Author Published on: July 16, 2019 12:50 AM
स्कूलों के परिसर बिजली से वंचित कैसे और क्यों हैं!

किसी भी देश की बुनियाद कितनी मजबूत है, यह इससे तय होता है कि वहां शिक्षा और स्वास्थ्य का ढांचा कितना पुख्ता है! जहां तक हमारे देश में शिक्षा के समूचे तंत्र को दुरुस्त करने का सवाल है तो आजादी के बाद से आज तक लगातार इस दिशा में तमाम कवायदें की गर्इं, लेकिन फिर भी इतने मोर्चे अधूरे हैं कि इस मसले पर सब कुछ ठीक हो जाने का दावा करना मुश्किल है। यह अपने आप में एक परेशान करने वाली खबर है कि देश भर के सैंतीस फीसद यानी एक तिहाई से ज्यादा स्कूलों में आज भी बिजली नहीं है। यह खबर तब आई है जब पिछले कुछ समय से ये दावे चारों तरफ चर्चा के केंद्र में हैं कि देश के सभी गांवों तक बिजली पहुंचा दी गई है। सवाल है कि अगर गांव-गांव को बिजली से रोशन बना दिया गया है तो देश भर में इतनी बड़ी तादाद में स्कूलों के परिसर बिजली से वंचित कैसे और क्यों हैं! किसी भी स्कूल में अगर बिजली का कनेक्शन नहीं है तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि वहां बिजली पर निर्भर किसी शैक्षिक गतिविधि से लेकर रोशनी या फिर गरमी के मौसम में क्या स्थिति रहती होगी!

गौरतलब है कि एकीकृत जिला शिक्षा प्रणाली सूचना, 2017-2019 की रिपोर्ट में यह तथ्य उजागर हुआ है कि देश के केवल 63.14 फीसद स्कूलों में बिजली मौजूद थी। यह स्थिति तब है जब पिछले करीब ढाई-तीन दशकों से सरकारी स्कूलों में बुनियादी ढांचा मजबूत करने और इस तरह शिक्षा की सूरत में सुधार लाने के वादे और दावे लगातार किए जा रहे हैं। इसके अलावा, स्कूलों में दोपहर के भोजन की व्यवस्था का मकसद यही रहा है कि गरीब तबकों के बच्चों के न केवल पोषण का स्तर सुधारने में मदद मिले, बल्कि इस बहाने उन्हें स्कूली शिक्षा के दायरे में लाया जाए, ताकि समाज में शिक्षा की सूरत बेहतर हो। लेकिन अब खुद मानव संसाधन मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले तीन साल के दौरान स्कूलों में दोपहर में घटिया गुणवत्ता वाला भोजन खाने की वजह से देश भर से नौ सौ से ज्यादा बच्चों के बीमार होने के मामले सामने आए। ऐसी खबरें अक्सर आती रही हैं कि किसी स्कूल में मध्याह्न भोजन योजना के तहत परोसे गए खाने की वजह से कई बच्चे गंभीर रूप से बीमार हो गए। ऐसी घटनाएं जब होती हैं तब उन बच्चों और उन परिवारों की मनोस्थिति पर कैसा असर पड़ता होगा जो महज पेट में कुछ अन्न जाने और इस बहाने कुछ पढ़-लिख लेने की उम्मीद में स्कूल में जाते हैं!

यह एक आम आकलन है कि कोई भी स्कूल अगर बुनियादी ढांचे की कसौटी पर बेहतर है तो वहां पढ़ाई-लिखाई का माहौल भी अच्छा बन पाता है। पीने का पानी, साफ शौचालय, जरूरी संसाधनों से लैस कक्षाएं जैसी सुविधाओं के बावजूद अगर स्कूल में बिजली की सुविधा नहीं है तो बेहतर शैक्षिक प्रदर्शन में इन सहायक कारकों की भूमिका भी सीमित हो जाती है। शिक्षा का अधिकार कानून लागू हुए नौ साल से ज्यादा हो गए। इस अवधि में स्कूली शिक्षा की तस्वीर सुधारने के मोर्चे पर कुछ कामयाबी मिली है। लेकिन आज भी इस मोर्चे पर जो स्थिति है, उसे संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। स्कूली बच्चों में सीखने के स्तर के मसले पर अक्सर आने वाली रिपोर्टें निराश करती हैं। इसलिए जरूरत इस बात की है कि सरकारी स्कूलों को न केवल बिजली या दूसरी बुनियादी सुविधाओं को पूरी तरह से लैस किया जाए, बल्कि मध्याह्न भोजन से लेकर उन सभी योजनाओं पर अमल सुनिश्चित किया जाए जो इन स्कूलों में गुणवत्ता आधारित शिक्षा की सूरत को बेहतर बनाएं।

 

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