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संपादकीय: संकट में ग्राहक

पीएमसी के खाताधारकों के पैसे फंसने का मामला नोटबंदी की पीड़ा से भी ज्यादा मारक है। जिस व्यक्ति के अपने नब्बे लाख रुपए हों और वह दिव्यांग बेटे का इलाज भी न करवा पाए तो उसका सदमे में जाना स्वाभाविक है।

Author Published on: October 16, 2019 2:02 AM
आरबीआइ का कहना है कि अब बैंक के सतहत्तर फीसद खाताधारक अपना पूरा पैसा निकाल लेंगे।

पंजाब एंड महाराष्ट्र सहकारी बैंक (पीएमसी) के ग्राहकों को अपना ही जमा पैसा नहीं मिल पाने की वजह से कितने गंभीर संकटों का सामना करना पड़ रहा है, कोई सोच भी नहीं सकता। लोग आज अपने पैसे के लिए तरस रहे हैं। पिछले तीन हफ्तों से पीएमसी बैंक और रिजर्व बैंक के बाहर धरने-प्रदर्शन हो रहे हैं। कई ग्राहक जिनकी लाखों रुपए की एफडी बैंक में फंस गई हैं, सदमे से उबर नहीं पा रहे। सोमवार को एक ऐसे ही खाताधारक की तनाव के चलते दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई। इस ग्राहक की नब्बे लाख रुपए की एफडी बैंक में फंसी है। वह सोमवार को बैंक के सामने प्रदर्शन करके घर लौटा था और पैसे नहीं निकल पाने के कारण तनाव में था। इस तरह के तनाव और मानसिक पीड़ा से हजारों ग्राहक गुजर रहे हैं, लेकिन सरकार पर रत्ती भर असर नहीं दिखा है। सवाल है कि भ्रष्ट लोगों और बैंक का पैसा डकार कर भागने वालों के गुनाह का खमियाजा आखिर बैंक के ग्राहकों को क्यों भुगतना पड़े? आखिर कब तक लोग अपने पैसे के लिए तरसते रहेंगे?

पीएमसी के खाताधारकों के पैसे फंसने का मामला नोटबंदी की पीड़ा से भी ज्यादा मारक है। जिस व्यक्ति के अपने नब्बे लाख रुपए हों और वह दिव्यांग बेटे का इलाज भी न करवा पाए तो उसका सदमे में जाना स्वाभाविक है। लेकिन पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं है। इसी तरह पिछले महीने किडनी का ऑपरेशन करवा कर आए एक मरीज की पचास लाख रुपए की एफडी है, पर इलाज के लिए पैसे हाथ में नहीं हैं। यह व्यक्ति वित्त मंत्री के सामने गिड़गिड़ाता रहा, लेकिन किसी का दिल नहीं पसीजा। ऐसे ढेरों किस्से हैं।

बड़ी संख्या में वृद्धों की पेंशन का पैसा बैंक में जमा है, पर जरूरत भर का पैसा भी हाथ में नहीं तो किस काम का? एक तरफ सरकार नकदी लेनदेन को हतोत्साहित कर रही है, बैंकों में बचत को जमा करने के लिए लोगों को प्रेरित किया जा रहा है, डिजिटल लेनदेन को अनिवार्य करने की ओर अग्रसर है, दूसरी तरफ बैंकों में जमा पैसे की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है। आखिर यह कैसा विरोधाभास है!

हाल में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मुंबई में बैंक के ग्राहकों से मुलाकात की थी और उन्हें भरोसा दिलाया था कि उनका पैसा सुरक्षित है और ग्राहकों को राहत दिलाने के बारे में वे रिजर्व बैंक के गवर्नर से बात करेंगी। इस बीच रिजर्व बैंक ने पीएमसी बैंक से निकासी की सीमा पच्चीस हजार से बढ़ा कर चालीस हजार रुपए कर दी है। आरबीआइ का कहना है कि अब बैंक के सतहत्तर फीसद खाताधारक अपना पूरा पैसा निकाल लेंगे। लेकिन बाकी तेईस फीसद ग्राहकों का क्या होगा जिनकी बड़ी रकम बैंक में सावधि जमा के रूप में रखी है।

सवाल घूम-फिर कर यही आता है कि कैसे चालीस हजार रुपए में कोई छह महीने खींच पाएगा? क्यों नहीं लोगों को उनका जमा पैसा मिलना चाहिए? भारतीय रिजर्व बैंक की अनुमति से ही बैंक खुलते हैं और कारोबार करते हैं। लेकिन केंद्रीय बैंक किसी भी खाताधारक की अधिकतम एक लाख रुपए की ही सुरक्षा गारंटी लेता है। जब नकदी रखने को रोकने की कवायद चल रही तो इस सुरक्षा कवर को क्यों नहीं बढ़ाया जाना चाहिए? ये घटनाएं बता रही हैं कि भारत के बैंक सुरक्षित नहीं रह गए हैं। और दो-चार बैंकों के मामले सामने आए तो लोगों का बैंकिंग व्यवस्था से भरोसा उठते देर नहीं लगेगी। बैंकिंग व्यवस्था को लेकर भरोसा बनाना रिजर्व बैंक और सरकार की जिम्मेदारी बनती है।

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