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संपादकीय: संकट और बजट

नौकरीपेशा तबके की निगाहें करों में रियायत पर होती हैं।

सवाल है कि आज अर्थव्यवस्था जिस हालत में पहुंच चुकी है, उससे लोगों को कैसे मुक्ति मिलेगी।

वित्त वर्ष 2020-21 के बजट से यह साफ हो गया है कि आने वाले दिनों में ऐसा कोई चमत्कार होने की उम्मीद नहीं है जिससे अर्थव्यवस्था में जान आने के संकेत मिलते हों। बजट में सरकार ने जो कदम उठाए हैं, घोषणाएं की हैं, योजनाओं का एलान किया है और जिन-जिन क्षेत्रों के लिए जैसा बजट आबंटन किया है, वे इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि सरकार मंदी को लेकर जरा भी परेशान नहीं है, बल्कि वह सुधार की दीर्घावधि की नीतियों पर चल निकली है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट पेश करते हुए साफ कहा भी कि आर्थिक सुधारों को जारी रखा जाएगा। सरकार मान कर चल रही है कि आज का बोया बीज अने वाले दिनों में फल देगा, इसलिए तात्कालिक समस्याओं के बजाय दीर्घावधि की नीतियों पर चला जाए। लेकिन सवाल है कि आज अर्थव्यवस्था जिस हालत में पहुंच चुकी है, उससे लोगों को कैसे मुक्ति मिलेगी। बेरोजगारी कैसे दूर हो, यह गंभीर सवाल है। अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए पिछले साल सरकार ने कॉरपोरेट क्षेत्र को एक लाख पैंतालीस हजार करोड़ की जो रियायत दी थी, उसका असर अभी तक दिखना शुरू नहीं हुआ है। ऐसे में बजट में प्रस्तावित उपाय देश की अर्थव्यवस्था को कितनी जल्दी पटरी पा ला पाएंगे, कहना मुश्किल है।

बजट में सबसे ज्यादा जोर शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि क्षेत्र पर दिया गया है। शिक्षा प्रणाली में सुधार के लिए विदेशों से कर्ज और एफडीआइ के उपाय तलाशने की बात है। शिक्षा क्षेत्र के बजट में 99300 करोड़ रुपए रखे गए हैं। स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार के लिए 69 हजार करोड़ रुपए देने की बात है। कृषि क्षेत्र की हालत सुधारने के लिए 2.83 लाख करोड़ रुपए खर्च करने की योजना है। देश में नब्बे फीसद किसान खेतिहर मजदूर और छोटे किसान ही हैं जो किसी न किसी रूप में कर्ज में दबे हैं। पर बजट के उपायों में किसानों की समस्याओं का स्थायी हल नदारद है। छोटे-मझौले उद्योगों को राहत देने के लिए सरकार ने सीमा शुल्क में कटौती का जो कदम उठाया है, उससे घरेलू बाजार में मांग निकलने की उम्मीद जरूर बन सकती है। पर समस्या यह है कि नोटबंदी की वजह से जो उद्योग तबाह हो गए, वे फिर से कैसे खड़े हों? बजट ऐसे उद्योगों के लिए मददगार साबित होगा, इसमें संदेह है। बजट से आमजन खासतौर से मध्यम वर्ग को सबसे ज्यादा उम्मीदें होती हैं।

नौकरीपेशा तबके की निगाहें करों में रियायत पर होती हैं। लेकिन 2020-21 के बजट में नई कर व्यवस्था का समावेश करते हुए अब जिस तरह से दो नई कर व्यवस्थाएं बना दी गई हैं, वह राहत देने के बजाय संकट ही ज्यादा खड़े करेंगी। लोगों को एक कर व्यवस्था को चुन कर उसी के हिसाब से कर भुगतान करना होगा। नई कर व्यवस्था व्यक्तिगत आयकर दाता कोउसी तरह परेशान कर सकती है जैसे जीएसटी को लेकर व्यापारी हो रहे हैं। सरकार पैसा जुटाने के लिए अब एलआइसी व आइडीबीआइ में हिस्सेदारी बेचेगी। ये सरकार की खराब माली हालत का संकेत है। खनन, ऊर्जा, रियल एस्टेट जैसे प्रमुख क्षेत्रों को रफ्तार देने के लिए बजट से जिस तरह के उपायों की उम्मीद थी, उसने कारोबारियों को निराश ही किया है। मांग, निवेश और खपत का चक्र चल निकले, रोजगार बढ़े, इसके लिए बजट में ठोस समाधान नहीं हैं। सब कल के भरोसे है। बजट कैसा रहा, इसका अनुमान शेयर बाजार में आई भारी गिरावट से लगाया जा सकता है। जाहिर है, बजट न आम लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरा, न बाजार की।

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