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संपादकीय: उम्मीद और चुनौती

छोटे, मझौले उद्योग जो जीएसटी की मार से कराह रहे हैं उनके लिए भी अब कई चीजें आसान बनाई गई हैं, जैसे तीस दिन में रिफंड की वापसी। यह हकीकत है कि विदेशी निवेशक शेयर बाजार से पैसा इसलिए निकाल रहे हैं कि सरकार ने पूंजीगत लाभ पर अधिभार काफी बढ़ा दिया था।

Author Published on: August 26, 2019 1:04 AM
Nirmala Sitharamanवित्त मंत्री निर्मला सीतारमण।

पिछले कुछ महीनों से मंदी की मार झेल रही देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए वित्त मंत्री ने शुक्रवार को राहत के बड़े फैसलों का एलान किया। आम आदमी से लेकर कारोबारियों और बैंकिंग क्षेत्र से लेकर शेयर बाजारों तक के लिए सरकार ने जो कदम अब उठाए हैं अगर वे पहले ही उठा लिए जाते तो हालात बिगड़ने से बच सकते थे। ऐसा भी नहीं है कि सरकार मंदी की दस्तक को लेकर अनजान थी लेकिन समय पर कदम नहीं उठाने का संदेश यह गया कि अर्थव्यवस्था की हालत सरकार की प्राथमिकता में नहीं है। हालांकि बाजार में जान फूंकने के मकसद से रिजर्व बैंक ने इस वित्त वर्ष में तीन बार नीतिगत दरों में कटौती की, पर इसका भी अभी तक कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं दिखा है। इसलिए यह जरूरी हो गया था कि बैंकिंग क्षेत्र को बड़ा पैकेज दिया जाए ताकि कर्ज बाजार उठे और बाजार में मांग-आपूर्ति का चक्र फिर से चले। अब सभी तरह के कर्जों को रेपो रेट से जोड़ा गया है। रेपो रेट कम होगी तो कर्ज भी सस्ता होगा और लोग घर, गाड़ी या दूसरी जरूरतों के लिए कर्ज आसानी से ले सकेंगे। इससे आॅटोमोबाइल क्षेत्र और रियल एस्टेट कारोबार में फिर से जान आने की उम्मीद है।

हाल की मंदी के लिए जीएसटी और नगदी संकट को सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है। नीति आयोग के उपाध्यक्ष ने तो हाल में इस बात को माना भी है कि पिछले सत्तर साल में अर्थव्यवस्था में ऐसा नगदी संकट कभी नहीं आया। वित्त मंत्री ने इस समस्या को समझा है और इसीलिए बैंकों को सत्तर हजार करोड़ रुपए देने की बात कही है ताकि बैंक नगदी संकट से नहीं जूझें और कर्ज के कारोबार में तेजी लाएं। बाजार में नगदी की तरलता बढ़ाने की दिशा में यह बड़ा कदम साबित हो सकता है। दूसरी बड़ी राहत वाहन उद्योग को है जिसमें पिछले तीन महीनों के दौरान हजारों कर्मचारियों की नौकरी चली गई है और कई बड़े वाहन निर्माताओं ने मंदी के कारण उत्पादन बंद कर रखा है। सरकार ने अगले साल 31 मार्च तक बीएस-4 मानक वाली गाड़ियों की बिक्री का रास्ता साफ कर दिया है, भले बीएस -6 मानक की गाड़ियां बाजार में आ जाएं। वाहनों के पंजीकरण शुल्क बढ़ाने का फैसला भी वापस ले लिया है। सरकारी महकमों में पुराने वाहन निकाल कर नई गाड़ियां खरीदी जाएंगी। कुल मिला कर मकसद यह है कि गाड़ियों की बिक्री बढ़े और वाहन उद्योग में रौनक लौटे।

छोटे, मझौले उद्योग जो जीएसटी की मार से कराह रहे हैं उनके लिए भी अब कई चीजें आसान बनाई गई हैं, जैसे तीस दिन में रिफंड की वापसी। यह हकीकत है कि विदेशी निवेशक शेयर बाजार से पैसा इसलिए निकाल रहे हैं कि सरकार ने पूंजीगत लाभ पर अधिभार काफी बढ़ा दिया था। वित्त मंत्री ने इसे अब हटा लिया है। इसी तरह नया कारोबार (स्टार्टअप) शुरू करने वालों को एंजल टैक्स से छूट मिल गई है। सबसे बड़ी बात तो यह कि करदाताओं का उत्पीड़न नहीं होने देने का भरोसा दिया गया है। सरकार के समक्ष इस वक्त सबसे बड़ी चुनौती रोजगार पैदा करना है। अगर उद्योग संकट में रहेंगे तो कैसे रोजगार के अवसर बनेंगे? लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए वित्त मंत्री ने जो उपाय किए हैं वे एक तरह से बजट के पहले वाली स्थिति है। जाहिर है, बजट में अति-उत्साह में ऐसे कदम उठाए गए जिनसे अर्थव्यवस्था को धक्का पहुंचा। अब चुनौती अर्थव्यव्स्था को संकट से निकालने की है। ऐसे में ये उपाय कितने कारगर होते हैं, आने वाले दिनों में इसका पता चल जाएगा।

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