ताज़ा खबर
 

संपादकीय: जाति का दंश

उत्तराखंड में टिहरी जिले की नैनबाग तहसील में आयोजित एक विवाह समारोह में आमंत्रित लोग खाना खा रहे थे। वहीं एक दलित युवक जितेंद्र दास ने भी खाना लिया और कुर्सी पर बैठ कर खाने लगा। उसी भोज में खाना खा रहे उच्च कही जाने वाली जातियों के कुछ लोगों ने सिर्फ इसलिए जितेंद्र को बेरहमी से मारा-पीटा कि उसने उनके सामने कुर्सी पर बैठ कर खाने की हिम्मत कैसे की!

crime, crime news, murderप्रतीकात्मक तस्वीर।

जब भी समाज में जातिगत भेदभाव की वजह से कमजोर जातियों के लोगों पर जुल्म ढहाने को लेकर सवाल उठाया जाता है तो ऐसी घटनाओं को इक्का-दुक्का बता कर उनकी अनदेखी करने की कोशिश की जाती है। लेकिन आज भी अगर सिर्फ उच्च कही जाने वाली जातियों के बराबर बैठ कर खाना खाने की वजह से किसी दलित युवक को पीट-पीट कर मार डाला जाता है तब समझ में आता है कि हमारा समाज व्यवहार में अभी भी किन सामंती और पिछड़े मूल्यों को ढो रहा है। गौरतलब है कि उत्तराखंड में टिहरी जिले की नैनबाग तहसील में आयोजित एक विवाह समारोह में आमंत्रित लोग खाना खा रहे थे। वहीं एक दलित युवक जितेंद्र दास ने भी खाना लिया और कुर्सी पर बैठ कर खाने लगा। उसी भोज में खाना खा रहे उच्च कही जाने वाली जातियों के कुछ लोगों ने सिर्फ इसलिए जितेंद्र को बेरहमी से मारा-पीटा कि उसने उनके सामने कुर्सी पर बैठ कर खाने की हिम्मत कैसे की! जिस दौर में देश में आधुनिकता और विकास के नए कीर्तिमान कायम करने का दावा किया जा रहा है, उसमें ऐसी घटना पर कई बार यकीन करना मुश्किल हो जाता है। मगर आज भी दलितों के खिलाफ जातिगत हिंसा का सच बेहद तकलीफदेह और शर्मनाक है।

सवाल है कि आखिर किस वजह से कुछ लोगों को इस बात से परेशानी हो गई कि एक दलित युवक उनके सामने कुर्सी पर बैठ कर खाना खा रहा है? क्या यहां कारण सिर्फ यह नहीं है कि समाज में मौजूद जाति-व्यवस्था में कुछ लोगों को उच्च और कुछ को निम्न दर्जे का माना जाता है और इसी मुताबिक सामाजिक व्यवहार भी निर्धारित किए गए हैं? इस सच को स्वीकार करना कुछ लोगों के लिए क्यों नहीं संभव हो पा रहा है कि मनुष्य के रूप में जन्म लेने वाले सभी की हैसियत हर स्तर पर बराबर है? महज किसी जाति में पैदा होने के आधार पर खुद को श्रेष्ठ और किसी को निम्न मानना क्या एक तरह की मानसिक बीमारी नहीं है, जिसके शिकार लोग अपने से कम दर्जे पर माने जाने वालों के साथ अक्सर अमानवीयता की हद भी पार कर जाते हैं? कायदे से किसी कमजोर जातिगत पृष्ठभूमि से आने वाले व्यक्ति को बराबरी के स्तर पर लाने की कोशिश समर्थ तबकों को अपनी ओर से करनी चाहिए। मगर इसके उलट दलित-वंचित जातियों के लोगों के आगे बढ़ने, सक्षम होने या बराबरी के स्तर पर दिखने पर उच्च कही जाने वाली जातियों के लोगों के भीतर श्रेष्ठता की कुंठा क्यों हावी हो जाती है? इस कुंठा से उपजी हिंसा व्यक्ति को सिर्फ अमानवीय बना सकती है। खुद को सभ्य और संवेदनशील मानने वाला कोई भी इंसान इस पहचान से शर्मिंदा होगा।

विडंबना यह है कि हमारे देश में विकास की चकाचौंध में सारा जोर भौतिक निर्माण पर रहा है और सामाजिक विकास नीतियों पर गौर करने की जरूरत कभी नहीं समझी गई। जब तक जाति-व्यवस्था और इससे संचालित सामाजिक मनोविज्ञान को केंद्र में रख कर इससे छुटकारे का रास्ता नहीं निकाला जाएगा, तब तक समाज में जाति-आधारित हिंसा की बीमारी की जड़ों को कमजोर करना मुश्किल होगा। भारत की आजादी और जनतंत्र की घोषणा के बाद उम्मीद थी कि देश की इस सबसे बड़ी सामाजिक समस्या के बंधन ढीले होंगे, इसके जरिए कायम भेदभाव कम होकर खत्म भी होंगे। लेकिन आज भी अगर दलितों या कमजोर जातियों के लोगों को भेदभाव से भी आगे अत्याचार और जातिगत अपराधों के चलते जान गंवानी पड़ रही है तो यह सोचने का वक्त है कि सामाजिक विकास के इतने लंबे सफर में हमारा हासिल इतना अफसोसनाक क्यों है!

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 धरोहर और उदासीनता
2 आतंक के खिलाफ
3 हालात और चुनौती
ये पढ़ा क्या?
X