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संपादकीय: कारोबार और हथियार

कायदे से हथियारों के लाइसेंस उन लोगों को दिए जाते हैं, जिन्हें जान का जोखिम हो या संपत्ति वगैरह की रखवाली के लिए आवश्यक हो।

Author नई दिल्ली | Updated: February 3, 2020 1:16 AM
कीकत यह भी है कि कारोबार के लिए लाइसेंस लेना, हथियार खरीदने की तुलना में टेढ़ा काम है।

अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने के लिए सरकार कारोबार की सुगमता पर जोर देती रही है। इसके चलते पहले की तुलना में कुछ आसानी भी हुई है। इसी का नतीजा है कि भारत विश्व बैंक के कारोबार सुगमता सूचकांक में दुनिया के एक सौ नब्बे देशों में तिरसठवें स्थान पर पहुंच गया है। पिछले साल की तुलना में उसकी स्थिति चौदह स्थान बेहतर हुई है। यह निस्संदेह उत्साहजनक है। मगर हकीकत यह भी है कि कारोबार के लिए लाइसेंस लेना, हथियार खरीदने की तुलना में टेढ़ा काम है। आर्थिक सर्वे में केंद्र ने स्वीकार किया कि बहुत सारे राज्यों में कारोबारियों को ढाबा और रेस्तरां के लाइसेंस लेने के लिए करीब पैंतालीस दस्तावेज और अनापत्ति प्रमाण-पत्र लेने पड़ते हैं, जबकि बंदूक खरीदने के लिए महज उन्नीस दस्तावेज और अनापत्ति प्रणाण-पत्र की जरूरत पड़ती है। ढाबा खेलने के लिए पुलिस से अनापत्ति प्रणाण-पत्र लेना बंदूक के लिए अनापत्ति प्रमाण-पत्र लेने से कहीं जटिल काम है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि समाज में हथियारों का अतार्किक प्रदर्शन और हिंसक प्रवृत्ति को किस कदर बढ़ावा मिल रहा है, जबकि रोजगार के मोर्चे पर नए अवसर पैदा करना क्यों जटिल बना हुआ है।

कायदे से हथियारों के लाइसेंस उन लोगों को दिए जाते हैं, जिन्हें जान का जोखिम हो या संपत्ति वगैरह की रखवाली के लिए आवश्यक हो। मगर देखा जाता है कि बहुत सारे लोग महज शान के लिए हथियार लेकर घूमते हैं। बंदूक लेकर चलने से समाज में उनकी दबंगई बनी रहती है। जबकि वास्तव में उन्हें न तो जान का खतरा होता है और न संपत्ति की रक्षा के लिए जरूरत होती है। पहले हथियार रखने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने की मंशा से कड़े नियम-कायदे पालन किए जाते थे। यहां तक कि कारतूस वगैरह की खरीद-बिक्री को नियंत्रित किया गया। मगर बाद में जब देखा गया कि वैध रूप से हथियार रखने की इजाजत न मिलने की वजह से बहुत सारे लोग अवैध हथियार रखने लगे हैं और इससे अपराध को रोकने में मुश्किलें आ रही हैं, तो प्रशासन ने हथियार खरीदने की शर्तें आसान कर दीं। इसी का नतीजा है कि बहुत सारे लोग जरूरत न होने के बावजूद बंदूक, पिस्तौल वगैरह खरीदने लगे। हैरानी की बात नहीं कि पिछले कुछ सालों में निजी इस्तेमाल के लिए हथियारों की बिक्री बढ़ी है।

किसी भी सभ्य समाज में हथियारों की जरूरत नहीं होती। यह भी सच है कि हथियार रखने से सुरक्षा का बोध पैदा होने के बजाय हिंसक वृत्ति को बढ़ावा मिलता है। यह अकारण नहीं है कि मामूली रंजिश में आए दिन गोली चला कर किसी को मार डालने, सरेआम हथियार तान कर धमकाने, खुदकुशी में निजी हथियारों का इस्तेमाल आदि की घटनाएं देखने-सुनने को मिलती हैं। बेवजह हथियारों की खरीद और प्रदर्शन का ही नतीजा है कि शादी-विवाह जैसे मौकों पर खुशी जाहिर करने के लिए दागी गई गोली से किसी की जान चली जाती है। शादियों में बंदूक लेकर चलना फैशन-सा हो गया है। वहां नशे की हालत में गोली दागी जाती है और मामूली चूक से किसी की जान चली जाती है। इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना पुलिस के लिए बड़ी चुनौती है। फिर भी हैरानी की बात है कि हथियारों के लाइसेंस जारी करने में पर्याप्त कड़ाई नहीं बरती जा रही। देश की तरक्की हथियारों के प्रदर्शन से नहीं, कारोबार को सुगम बनाने से होगी, यह बात सरकारों को समझने की जरूरत है।

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