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हादसे की पटरी

सीमांचल एक्सप्रेस हादसे से एक बार फिर जाहिर हुआ है कि रेल सुरक्षा को लेकर समुचित उपाय जुटाने में रेल विभाग लगातार विफल साबित हो रहा है। रविवार तड़के लगभग चार बजे सीमांचल एक्सप्रेस के ग्यारह डिब्बे पटरी से उतर गए।

Author February 4, 2019 2:59 AM
इस दुर्घटना में सात लोगों की मौत हो गई और करीब चौबीस लोग गंभीर रूप से घायल हैं। (PTI Photo)

सीमांचल एक्सप्रेस हादसे से एक बार फिर जाहिर हुआ है कि रेल सुरक्षा को लेकर समुचित उपाय जुटाने में रेल विभाग लगातार विफल साबित हो रहा है। रविवार तड़के लगभग चार बजे सीमांचल एक्सप्रेस के ग्यारह डिब्बे पटरी से उतर गए। इस दुर्घटना में सात लोगों की मौत हो गई और करीब चौबीस लोग गंभीर रूप से घायल हैं। दुर्घटना की वजहों का अभी ठीक-ठीक पता नहीं चल पाया है। मगर शुरुआती जांच में पता चला है कि रेल की पटरी टूटने या पहले से टूटी होने की वजह से यह हादसा हुआ। समझना मुश्किल है कि पटरियों की निगरानी करने वाले दस्ते को ऐसी किसी गड़बड़ी की जानकारी कैसे नहीं मिली। निगरानी दस्ता नियमित पटरियों की जांच करता है। ऐसे में अगर रेल की कोई पटरी टूटी होती या फिर उसमें कहीं कोई कमजोरी होती, तो उसे दुरुस्त करना उसकी जिम्मेदारी थी। कई बार तेज रफ्तार गाड़ियां गुजरने की वजह से पटरियों के नीचे की पट्टियों या फिर उन्हें जोड़ने वाले पुर्जों में ढीलापन आ जाता है। अगर समय रहते उसे दुरुस्त न किया जाए, तो वह हादसे की वजह बनता है। अगर पटरियों में गड़बड़ी की वजह से यह हादसा हुआ, तो निस्संदेह यह निगरानी दस्ते की लापरवाही का नतीजा था।

यह इस तरह का पहला हादसा नहीं है। हर साल ऐसी बड़ी दुर्घटनाएं हो जाती हैं। पिछले दस महीनों में यह पांचवां बड़ा हादसा है। इसके अलावा छोटे-मोटे हादसे होते रहते हैं, जिसमें मानव रहित फाटकों पर गाड़ियों से वाहनों और लोगों के टकराने से मौतें हो जाती हैं। ऐसे हादसों पर प्राय: ध्यान नहीं दिया जाता, जिनमें जान-माल का कोई नुकसान नहीं होता। पिछले चार सालों में रेल दुर्घटनाओं की तादाद सबसे अधिक रही है। पर फिर भी रेल महकमा इस पर काबू पाने का कोई ठोस उपाय जुटाने में विफल साबित हुआ है। ज्यादातर रेल दुर्घटनाओं के पीछे बड़ी वजह रेलकर्मियों की लापरवाही रही है। इन दुर्घटनाओं के पीछे रेल विभाग का एक तर्क यह भी रहा है कि चूंकि रेल लाइनों के सुधार का काम बहुत तेजी से हो रहा है और उसी पटरी पर से ट्रेनों को भी गुजारना होता है, इसलिए कभी-कभार ऐसे हादसे हो जाते हैं। यह तर्क विचित्र है। यों ताजा रेल बजट में दावा किया गया है कि ज्यादातर रेल लाइनों का सुधार कार्य पूरा हो चुका है, बिना फाटक की क्रासिंग अब न के बराबर रह गई हैं, रेल लाइनों के विस्तार का काम तेजी से हो रहा है।

रेल सुरक्षा संबंधी उपाय काफी हद तक जुटाए जा चुके हैं। पर हैरानी की बात है कि यह हादसा कैसे हो गया। रेल सेवाओं को विश्वस्तरीय मानकों के अनुरूप ढालने और तेज रफ्तार गाड़ियां चलाने के दावे तो खूब किए जाते हैं। बुलेट ट्रेन चलाने का भी प्रस्ताव है। पर जब रेल पटरियों को ही विश्वसनीय नहीं बनाया जा सका है, तो उन पर तेज रफ्तार गाड़ियां चलाने का सपना भला कैसे पूरा किया जा सकेगा। तमाम क्षेत्रों में, यहां तक कि टिकट बुकिंग के मामले में रेलवे भी कंप्यूटरीकृत प्रणाली अपना चुका है, पर दुर्घटना पर काबू पाने के मामले में अभी तक ऐसी प्रणाली को नहीं अपनाया जा सका है। जब तक रेल संचालन की पुरानी पद्धति छोड़ कर नई तकनीक का उपयोग नहीं होता और पटरियों को पुख्ता बनाने पर जोर नहीं दिया जाता, ऐसे हादसों पर काबू पाना मुश्किल बना रहेगा।

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