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संपादकीय: सलीका और सवाल

पाकिस्तान ने भारतीय उच्चायुक्त को वहां तीर्थयात्रा पर गए सिख श्रद्धालुओं से मिलने नहीं दिया। भारत से अठारह सौ श्रद्धालुओं का समूह तीर्थाटन सुगमता संधि के तहत बैसाखी पर्व पर गुरद्वारा पंजा साहिब और ननकाना साहिब की यात्रा पर गया था।

Author April 17, 2018 5:12 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

भारत और पाकिस्तान के रिश्ते दशकों से उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। पर दो देशों के बीच कितना भी तनावपूर्ण दौर क्यों न हो, राजनयिक शिष्टता का हमेशा पालन किया जाता है, किया जाना चाहिए। इसलिए पिछले हफ्ते पाकिस्तान ने जो किया वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। गौरतलब है कि पाकिस्तान ने भारतीय उच्चायुक्त को वहां तीर्थयात्रा पर गए सिख श्रद्धालुओं से मिलने नहीं दिया। भारत से अठारह सौ श्रद्धालुओं का समूह तीर्थाटन सुगमता संधि के तहत बैसाखी पर्व पर गुरद्वारा पंजा साहिब और ननकाना साहिब की यात्रा पर गया था। लेकिन पाकिस्तान ने भारतीय उच्चायुक्त को न तो गुरद्वारे जाकर उनसे मिलने दिया न वाघा सीमा पर। इस पर भारत सरकार ने उचित ही सख्त एतराज जताया है और पाकिस्तान के इस कदम को कूटनीतिक बेअदबी और विएना संधि का उल्लंघन करार दिया है। पाकिस्तानी अधिकारियों ने भारतीय उच्चायुक्त को बीच रास्ते से ही लौटने के लिए बाध्य कर दिया। जबकि यह एक सामान्य प्रक्रिया है कि भारतीय राजनयिकों को भारत से आने वाले तीर्थयात्रियों के तीर्थस्थल पर जाने और उनसे संपर्क की छूट होती है। ऐसी छूट का मकसद किसी आपातस्थिति, खासकर स्वास्थ्य संबंधी मुश्किलों के मद्देनजर एक-दूसरे की मदद करना है।

भारतीय उच्चायुक्त को भारत से गए तीर्थयात्रियों से मुलाकात न करने देने के पीछे पाकिस्तान ने सुरक्षा संबंधी तर्क दिया है, जो गले नहीं उतरता। अपने देश से आए तीर्थयात्रियों से उच्चायुक्त के मिलने में सुरक्षा संबंधी क्या समस्या हो सकती थी! और अगर पाकिस्तान सरकार के पास सुरक्षा के लिए खतरे संबंधी कोई खुफिया सूचना थी, या कोई अंदेशा था, तो उससे निपटने और सुरक्षा मुहैया कराने की जिम्मेदारी किसकी थी? जाहिर है, पाकिस्तान सरकार की ही! अगर वह भारत के प्रधानमंत्री के अचानक पहुंच जाने पर सुरक्षा संबंधी कोई समस्या नहीं आने दे सकती, तो सिख तीर्थयात्रियों से भारतीय उच्चायुक्त की सुरक्षित मुलाकात का इंतजाम क्यों नहीं कर सकती थी? पाकिस्तान का यह व्यवहार विएना संधि, 1961 और तीर्थयात्रियों की बाबत तय किए द्विपक्षीय प्रोटोकॉल का उल्लंघन तो है ही, हाल में दोनों देशों के बीच बनी सहमति पर पानी फेरना भी है। कोई पखवाड़े भर पहले भारत और पाकिस्तान राजनयिकों के साथ व्यवहार से संबंधित मसलों का समाधान करने को राजी हुए थे। उस रजामंदी का क्या हुआ? पाकिस्तान में भारतीय राजनयिकों के साथ बदसलूकी का यह कोई पहला या अकेला मामला नहीं है। आक्रामक निगरानी रखे जाने और खतरनाक ढंग से पीछा किए जाने की शिकायत भारत के राजनयिकों ने कई बार की है। पर यह सिलसिला बंद नहीं हुआ है।

ज्यादा वक्त नहीं हुआ, जब इस्लामाबाद में भारतीय राजनयिकों के आवासीय परिसर पर पाक एजेंसियों ने छापा मारा था। इस पर भारतीय उच्चायुक्त ने पाकिस्तान के विदेश सचिव से मुलाकात कर विरोध जताया था। भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव का खमियाजा उन लोगों को भी भुगतना पड़ता है जो जाने-अनजाने सीमा पार कर जाते हैं। उन्हें न कानूनी मदद मिल पाती है न उन तक राजनयिक पहुंच होने दी जाती है। कई बार खुद उनके देश के दूतावास ही उनकी सुध नहीं लेते। उनके परिजनों को पता नहीं चलता कि वे कहां और किस हाल में हैं। वे पराए देश की जेल में सड़ते रहते हैं। जब कोई संबंध सुधार की कोई पहल होती है, तो सौहार्द का कूटनीतिक इजहार करने के लिए उनमें से कुछ को रिहा कर दिया जाता है। लेकिन आपसी संबंधों में कितना भी उतार-चढ़ाव क्यों न हो, मानवाधिकारों का और राजनयिक शिष्टता का लिहाज किया ही जाना चाहिए।

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