jansatta Editorial Rumor Fire about People are losing their lives due to false news on social media - संपादकीय : अफवाह की आग - Jansatta
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संपादकीय : अफवाह की आग

विडंबना यह है कि एक जागरूक समाज बनाने के दावे के तहत जिस डिजिटल इंडिया के नारे को जोर-शोर से बढ़ावा दिया गया, आज वह बहुत सारे लोगों को ऐसी भीड़ में तब्दील कर रहा है जो किसी खबर पर सोचने और उसके सही या गलत होने का अंदाजा लगा पाने में सक्षम नहीं है।

Author June 15, 2018 3:28 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

पिछले कुछ समय से लगातार ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं जिनमें किसी अफवाह की जद में आकर लोगों की भीड़ जमा हो जाती है और सिर्फ शक के आधार पर अनजान व्यक्ति को पीट-पीट कर मार डालती है। बुधवार को एक बार फिर महाराष्ट्र और झारखंड में सिर्फ शक के आधार पर भीड़ ने चार लोगों को पीट-पीट कर मार डाला। महाराष्ट्र के औरंगाबाद में जहां लुटेरे होने की अफवाह में भीड़ ने दो लोगों की हत्या कर दी, वहीं झारखंड के गोड्डा में पशु चुराने के संदेह में दो लोगों को इसी तरह मार डाला। हाल ही में असम में बच्चा चुराने की अफवाह फैला कर ऐसा माहौल बनाया गया कि लोगों ने दो युवकों की बर्बरता से पिटाई की और मार डाला। कुछ समय पहले बंगलुरु और हैदराबाद से भी बच्चा चुराने की अफवाह में आकर लोगों के मारे जाने की ऐसी ही घटनाएं सामने आर्इं थीं। हैरानी की बात है कि जब सच्चाई का पता चलता है कि ऐसी हत्या अफवाह का नतीजा थी, उसकेबावजूद लोग किसी खबर पर शक करने और अपने स्तर से सोचने की जरूरत नहीं समझते हैं।

विडंबना यह है कि एक जागरूक समाज बनाने के दावे के तहत जिस डिजिटल इंडिया के नारे को जोर-शोर से बढ़ावा दिया गया, आज वह बहुत सारे लोगों को ऐसी भीड़ में तब्दील कर रहा है जो किसी खबर पर सोचने और उसके सही या गलत होने का अंदाजा लगा पाने में सक्षम नहीं है। यह बेवजह नहीं है कि आज इस तरह की अफवाहों को तेजी से फैलाने के लिए वाट्स ऐप या सोशल मीडिया के दूसरे मंचों को हथियार के तौर पर इस्तेमाल में लाया जाने लगा है। भीड़ के हाथों किसी के मारे जाने की ज्यादातर घटनाओं में यही तथ्य सामने आया है कि वाट्स ऐप या सोशल मीडिया पर किसी झूठी खबर, तस्वीर या वीडियो को सच बता कर बहुत सारे लोगों के मोबाइल पर भेज दिया गया। फिर जिन लोगों के पास ये झूठे संदेश पहुंचे, उन्होंने कुछ भी सोचना-समझना जरूरी नहीं समझा और एक जगह जमा होकर हिंसक भीड़ में तब्दील हो गए और किसी निर्दोष को मार डाला। बाद में पुलिस भले सक्रिय होती हो, कुछ आरोपी गिरफ्तार किए जाते हों, लेकिन ऐसी अफवाह फैलाने वाले शायद ही कभी पकड़ में आए हों। इसीलिए यह शक भी होता है कि क्या इस तरह की अफवाहों के पीछे कोई संगठित गिरोह भी है!

दरअसल, वाट्स ऐप या सोशल मीडिया पर कई बार ऐसे संदेश जारी कर दिए जाते हैं, जिन्हें देख कर साफ पता चलता है कि उन्हें सोच-समझ कर तैयार किया गया है। ये संदेश किसी खास सामाजिक-राजनीतिक मुद्दे पर राय बनाने की कोशिश भी हो सकते हैं। लेकिन कई संदेश, फोटो या वीडियो ऐसे भी होते हैं, जिनका मकसद लोगों के बीच उन्माद फैलाना होता है। अफवाहों के असर में आया व्यक्ति यह भी याद रखने की स्थिति में नहीं रह जाता कि अगर किसी व्यक्ति ने कोई गैरकानूनी काम किया है तो उस पर कार्रवाई करने के लिए पुलिस या प्रशासनिक तंत्र मौजूद है। भीड़ का यह चरित्र कोई नया नहीं है, लेकिन बेहद चिंताजनक है। भीड़ में तब्दील हो गए व्यक्ति के पास सही-गलत में फर्क करने या सोचने-समझने की ताकत नहीं रह जाती है। अगर इस प्रवृत्ति पर लगाम लगाने के मकसद से सरकार की ओर से सामाजिक जागरूकता अभियान चलाने के साथ-साथ कानूनी स्तर पर सख्त कदम नहीं उठाए गए तो लंबे समय में इसके नतीजे भयावह रूप में सामने आ सकते हैं।

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