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हादसों की सड़क

जब किसी महामारी के चलते लोगों की मौत की खबरें सुर्खियां बनने लगती हैं तो इससे निपटने के लिए हर संभव उपाय करने की कोशिश की जाती है। लेकिन देश में सड़क हादसों को लेकर कोई संवेदनशीलता नहीं दिखती। शायद यही वजह है कि जनहित याचिका दायर कर सर्वोच्च न्यायालय से देश में सड़क सुरक्षा […]

Author May 25, 2015 2:11 PM

जब किसी महामारी के चलते लोगों की मौत की खबरें सुर्खियां बनने लगती हैं तो इससे निपटने के लिए हर संभव उपाय करने की कोशिश की जाती है। लेकिन देश में सड़क हादसों को लेकर कोई संवेदनशीलता नहीं दिखती। शायद यही वजह है कि जनहित याचिका दायर कर सर्वोच्च न्यायालय से देश में सड़क सुरक्षा के मानकों और निगरानी के मसले पर ध्यान देने की मांग की गई थी। इसके मद्देनजर करीब महीने भर पहले न्यायालय ने न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन की अध्यक्षता में एक समिति गठित की, जिसने पिछले हफ्ते कुछ अहम दिशा-निर्देश जारी किए। सड़क हादसों में जान गंवाने वाले ज्यादातर लोग दूसरों की गलतियों के शिकार होते हैं। अगर तत्काल इलाज की सुविधा मिले, तो कइयों की जान बचाई जा सकती है। इसलिए सर्वोच्च अदालत की ओर से गठित समिति ने ठीक ही कहा है कि ‘हिट ऐंड रन’ के सभी मामलों में हादसे को अंजाम देने वाले वाहन की पहचान के साथ-साथ पीड़ितों के इलाज की व्यवस्था और उसका खर्च वहन करने की जिम्मेदारी सरकार की है।

यों भी, सड़क यातायात सुचारु और सुरक्षित हो, इसका इंतजाम करना सरकार का दायित्व है। अगर कोई व्यक्ति लापरवाह या बेलगाम होकर वाहन चलाता है और उसका खमियाजा नाहक ही दूसरे को भुगतना पड़ता है तो उसकी जवाबदेही सरकार को भी लेनी चाहिए। इसके अलावा, सड़क हादसों का सबसे बड़ा कारण शराब पीकर वाहन चलाना है। इस हालत में न सिर्फ चालक खुद को जोखिम में डालता है, बल्कि वह दूसरों के लिए भी खतरनाक साबित होता है। सड़क किनारे आसानी से शराब मिलना इस समस्या को बढ़ाता है। समिति ने इस पर भी गौर किया कि रास्तों के किनारे लगे बड़े-बड़े होर्डिंग चालकों का ध्यान बंटाते हैं और कई बार यह दुर्घटना का सबब बनता है। इसलिए समिति ने यह भी कहा है कि सड़क किनारे शराब की बिक्री पर पूरी तरह प्रतिबंध हो और राजमार्गों से, जहां गाड़ियां अमूमन तेज रफ्तार से चलती हैं, होर्डिंग हटाए जाएं।

मोटरगाड़ियों और दूसरे वाहनों की तादाद में लगातार इजाफा हुआ है। इसी के साथ यातायात को नियंत्रित या नियोजित करना मुश्किल होता गया है। आज किसी महामारी या आपदाओं से मरने वालों की कुल संख्या के मुकाबले सड़क हादसों में ज्यादा लोगों की जान जाती है। फर्राटे से वाहन दौड़ाते लोग शायद यह मान कर चलते हैं कि सड़क पर उनके अलावा कोई और नहीं है। किसी चौराहे पर लाल बत्ती को अनदेखा करके सड़क पार करना हो, तय सीमा से तेज गाड़ी चलाना या फिर गलत तरीके से आगे निकलने की कोशिश, यह सब आम प्रवृत्ति बन चुकी है। लिहाजा, सड़क हादसों पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। अकेले 2013 में हुए सड़क हादसों में एक लाख बयालीस हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। दुनिया भर के कुल वाहनों में भारत की हिस्सेदारी एक फीसद है, लेकिन कुल दुर्घटनाओं में दस फीसद। ऐसी स्थिति में यह सोचने की जरूरत है कि हमारे यहां यातायात के मामले में बनाई गई नीतियां कितनी कारगर हैं और उन पर अमल की हकीकत क्या है। कई देशों में जहां सड़क हादसों में कमी लाने के लिए नीतिगत और व्यावहारिक स्तर पर सार्थक कोशिशें की गर्इं और इसमें काफी हद तक कामयाबी मिली, वहीं भारत में साल-दर-साल हालत और खराब होती गई है। इसलिए समिति की सिफारिशों को गंभीरता से लेने की जरूरत तो है ही, और भी उपाय करने होंगे।

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