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संपादकीय: राहत की परीक्षा

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने अगले शैक्षणिक सत्र के लिए बारहवीं कक्षा के अंग्रेजी कोर विषय के प्रश्न-पत्र के ढांचे में कई अहम बदलाव किए हैं। पहले जहां विद्यार्थियों को चालीस प्रश्नों के उत्तर देने पड़ते थे, वहीं अगले साल मार्च में होने वाली परीक्षा में पैंतीस प्रश्न होंगे।

Author October 5, 2018 2:36 AM
पाठ्यक्रम विशेषज्ञों की बैठक में इस पर विचार-विमर्श के बाद परीक्षा के स्वरूप में बदलाव किया गया।(प्रतीकात्मक तस्वीर)

इस बात पर लंबे समय से बहस चलती रही है कि स्कूली शिक्षा का पाठ्यक्रम ऐसा हो कि विद्यार्थियों पर बोझ न बने और वे किसी भी विषय को पढ़ते हुए सहज महसूस करें। इस पक्ष को ज्यादा अहमियत इसलिए मिली कि जिन पाठ्यक्रमों को पढ़ते हुए बच्चे सहज और तनावरहित रहेंगे, उसे समझने और ग्रहण करने में भी उन्हें आसानी होगी। मगर यह किसी से छिपा नहीं है कि स्कूलों में न केवल ऊपरी यानी नौवीं-दसवीं या बारहवीं, बल्कि प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों पर भी इतनी सारी किताबें लाद दी जाती रही हैं कि वे पाठ्यक्रम को पूरा तो करते हैं, लेकिन शायद सिर्फ परीक्षाओं में नंबर पाने के लिहाज से। यानी किसी विषय को समझ कर उसे ग्रहण करने के बजाय उनके लिए पाठ को रट कर याद या पूरा करने का विकल्प ज्यादा बेहतर रहा है। अगर बच्चों में विश्लेषण और आकलन क्षमता की कमजोरी की मुख्य वजह के तौर पर पाठ्यक्रमों के बोझ को भी देखा जाता है तो यह अस्वाभाविक नहीं है। इसलिए लगभग सभी शिक्षाविदों ने इस बात की वकालत की है कि स्कूली पाठ्यक्रमों को इस तरह तैयार किया जाना चाहिए कि वे विद्यार्थियों के लिए बोझ न साबित हों।

इसके मद्देनजर समय-समय पर बस्ते का बोझ कम करने के मकसद से शिक्षण और परीक्षा की नई पद्धतियों पर बात हुई है और नए पाठ्यक्रम भी तैयार किए गए हैं। इस लिहाज से देखें तो सीबीएसई यानी केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने अगले शैक्षणिक सत्र के लिए बारहवीं कक्षा के अंग्रेजी कोर विषय के प्रश्न-पत्र के ढांचे में कई अहम बदलाव किए हैं। पहले जहां विद्यार्थियों को चालीस प्रश्नों के उत्तर देने पड़ते थे, वहीं अगले साल मार्च में होने वाली परीक्षा में पैंतीस प्रश्न होंगे। हो सकता है कि यह कोई बड़ी राहत नहीं हो, लेकिन निर्धारित समय में पांच प्रश्न कम किए जाने का महत्त्व यह है कि परीक्षार्थियों को अब बाकी प्रश्नों के उत्तर की गुणवत्ता बेहतर करने के लिए ज्यादा समय मिल सकेगा। यों भी किसी अंश पर आधारित प्रश्नों के उत्तर देने की क्षमता का आकलन करने के मामले में ग्यारह-बारह सौ शब्दों के तीन हिस्सों के बजाय नौ सौ शब्दों के दो अंशों की समान उपयोगिता है। लेकिन कई बार इसकी जांच के लिए इतने प्रश्न लाद दिए जाते हैं कि वह विद्यार्थियों के लिए बोझ बन जाता है।

दरअसल, सीबीएसई ने इस मसले पर परीक्षा में शामिल विभिन्न पक्षों से राय मंगाई थी। फिर पाठ्यक्रम विशेषज्ञों की बैठक में इस पर विचार-विमर्श के बाद परीक्षा के स्वरूप में बदलाव किया गया। जाहिर है, परीक्षा के नए ढांचे में विद्यार्थियों को निर्धारित वक्त में अंग्रेजी कोर के प्रश्नों का उत्तर देने के लिए ज्यादा समय मिलेगा और वे बेहतर नतीजे की उम्मीद कर सकेंगे। फिलहाल यह नियम अंग्रेजी में लागू होगा। लेकिन अच्छा हो कि बाकी विषयों में भी ऐसे पाठ्यक्रम और प्रश्न-पत्र तैयार किए जाएं, ताकि कम समय में विद्यार्थियों को बेहतर गुणवत्ता वाली शिक्षा मुहैया कराई जा सके और उनकी पढ़ाई-लिखाई की क्षमता का आकलन हो सके। हालांकि किताबों और पाठ्यक्रमों को एक बोझ के रूप में बच्चों पर थोपने की शिकायत आमतौर पर निजी स्कूलों को लेकर ही ज्यादा रही है। लेकिन कहीं भी शिक्षा और परीक्षा अगर विद्यार्थियों के लिए तनाव का कारण न बने, तो उसकी गुणवत्ता और नतीजे में स्वाभाविक रूप से बेहतरी दर्ज की जा सकती है।

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