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संपादकीय: राहत का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले पर अमल कराने के लिए देश के सभी राज्यों को बारह हफ्ते के भीतर कानून में संशोधन की मोहलत दी है। वर्तमान में यह कानून सिर्फ दिल्ली में लागू है। ऐसा नहीं है कि देश के बाकी राज्य इसे लागू कर पाने में असमर्थ हों। लेकिन इसके लिए किसी भी राज्य ने अपनी तरफ से कोई पहल करने की कोशिश की हो, ऐसा देखने को नहीं मिलता।

Author September 15, 2018 1:57 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (एक्सप्रेस फोटो)

सड़क हादसे की दर्दनाक पीड़ा से गुजरने के बाद मृतक या पीड़ित के परिजनों को मुआवजे के लिए सालों-साल अदालतों के धक्के खाने पड़ते हैं। यह कानूनी प्रक्रिया पीड़ित पक्ष के घावों पर मरहम लगाने के बजाय उसे तब और तोड़ देती है, जब मुआवजा मिलने का रास्ता ही बंद हो जाता है। वह भी सिर्फ इसलिए कि पीड़ित को जिस वाहन ने चोट पहुंचाई या जो उसकी मौत का कारण बना, उस वाहन का बीमा नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे पीड़ितों के लिए राहत देने वाला एक महत्त्वपूर्ण फैसला दिया है। सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि बिना बीमा वाले वाहनों से अगर कोई सड़क दुर्घटना होती है तो ऐसे वाहन को नीलाम किया जाए और नीलामी की इस रकम का इस्तेमाल पीड़ितों को मुआवजा देने में हो। अदालत ने साफ कहा है कि यह व्यवस्था सभी तरह की सड़क दुर्घटनाओं पर लागू होगी। दुर्घटना में शामिल वाहन की नीलामी से आया पैसा मोटर वाहन दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण में जमा कराना होगा। शीर्ष अदालत ने यह फैसला सड़क हादसे के शिकार हुए एक पीड़ित की पत्नी की याचिका पर दिया। पीड़ित की पत्नी को मोटर वाहन दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण ने मुआवजा देने से इसलिए मना कर दिया था कि जिस वाहन से उसका पति हादसे का शिकार हुआ था, उसका बीमा नहीं था। ऐसे में अदालत के इस फैसले से बिना बीमे के चलने वाले वाहनों की समस्या से निपटने में भी मदद मिलेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले पर अमल कराने के लिए देश के सभी राज्यों को बारह हफ्ते के भीतर कानून में संशोधन की मोहलत दी है। वर्तमान में यह कानून सिर्फ दिल्ली में लागू है। ऐसा नहीं है कि देश के बाकी राज्य इसे लागू कर पाने में असमर्थ हों। लेकिन इसके लिए किसी भी राज्य ने अपनी तरफ से कोई पहल करने की कोशिश की हो, ऐसा देखने को नहीं मिलता। इसके लिए महज कानून में संशोधन की जरूरत थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अब उम्मीद बंधी है कि इस दिशा में ठोस पहल होगी और सड़क हादसे के पीड़ितों को मुआवजे के लिए ठोकरें नहीं खानी पड़ेंगी। देश में जिस तेजी से सड़क हादसे बढ़ रहे हैं, उसमें तकरीबन चार लाख लोग हर साल मारे जाते हैं, जबकि घायलों की संख्या इससे कई गुना ज्यादा होती है। सड़क हादसों में जिन परिवारों के सदस्य जान से हाथ धो बैठते हैं या शारीरिक विकलांगता के शिकार हो जाते हैं, उन्हें मुआवजे के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है।

देश में ज्यादातर वाहन बिना बीमे के बेधड़क दौड़ रहे हैं। एक मोटे अनुमान के मुताबिक देश में करीब पच्चीस करोड़ से ज्यादा वाहन हैं और इनमें से सिर्फ सात करोड़ वाहनों का कानूनन बीमा है। देश के कुल वाहनों में दुपहिया वाहनों का हिस्सा सत्तर फीसद के आसपास है और हालत यह है कि आधे से ज्यादा दुपहिया वाहनों का बीमा नहीं है। हालांकि शीर्ष अदालत के हाल के एक फैसले के बाद अब हर वाहन मालिक को ‘थर्ड पार्टी इंश्योरेंस’ कराना अनिवार्य कर दिया गया है। लेकिन सबसे बड़ी बात है इन सारे नियम-कानूनों पर प्रभावी ढंग से अमल की। यह समस्या इसलिए भी ज्यादा गंभीर होती चली गई कि आज भी हमारी सरकारों के पास ऐसा कोई पुख्ता तंत्र नहीं है जो सड़क पर सिर्फ बीमा वाले वाहनों का परिचालन सुनिश्चित कर सके। बीमा कराने के लिए वाहन मालिकों को जागरूक बनाने के साथ ही उनमें कानून का भय भी पैदा किया जाना चाहिए, जिसमें गाड़ी जब्ती जैसा कड़ा प्रावधान हो।

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