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संपादकीय : कांग्रेस के कर्णधार

लगातार हार का सामना कर रही कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर फिर से सुगबुगाहट शुरू हो गई है। अध्यक्ष पद के लिए ले-देकर फिर वही एक नाम दोहराया जा रहा है- राहुल गांधी का।

Author नई दिल्ली | June 7, 2016 6:11 AM
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी नियामतपुर (पबंगाल) में रैली को संबोधित करते हुए। (पीटीआई फोटो)

लगातार हार का सामना कर रही कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर फिर से सुगबुगाहट शुरू हो गई है। अध्यक्ष पद के लिए ले-देकर फिर वही एक नाम दोहराया जा रहा है- राहुल गांधी का। कुछ साल पहले जब राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाने की मांग उठी थी तो पार्टी के जयपुर चिंतन शिविर में इस तर्क के साथ उन्हें उपाध्यक्ष बनाया गया कि अभी उन्हें पार्टी का नेतृत्व संभालने के लिए अनुभव की जरूरत है। तो क्या इस दौरान राहुल गांधी ने वह अनुभव हासिल कर लिया है, या फिर कांग्रेस नेताओं को नेहरू-गांधी परिवार के अलावा कोई विकल्प सूझता ही नहीं। पार्टी के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश लंबे समय से राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाने की वकालत करते आ रहे हैं।

अब भाजपा से मिल रही कड़ी चुनौतियों के मद्देनजर उन्हें फिर से राहुल गांधी में उम्मीदें नजर आने लगी हैं। हालांकि पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि सोनिया गांधी का कामकाज बेहतर है और उनके नेतृत्व में पार्टी फिर से अपना खोया जनाधार वापस लौटा सकती है। मगर जयराम रमेश और अमरिंदर सिंह जैसे नेताओं का मानना है कि जिस तरह भारतीय राजनीति में स्थितियां बदली हैं, उसके मुताबिक युवा नेतृत्व की जरूरत है। राहुल गांधी के पास संगठन में नई ऊर्जा भरने का जज्बा और नजरिया है। खासकर संचार माध्यमों के जरिए पार्टी की पकड़ मजबूत बनाने की दिशा में वे बेहतर साबित हो सकते हैं।

यह समझ से परे है कि कांग्रेस नेहरू-गांधी परिवार से बाहर नेतृत्व की कमान सौंपने के बारे में क्यों नहीं सोच पाती। उस पर लगातार परिवारवाद की तोहमत लगती रही है, व्यक्ति पूजा के आरोप लगते रहे हैं, फिर भी वह इससे मुक्त होने की कोशिश क्यों नहीं करना चाहती। जब भी पार्टी की कमान सौंपने की बात उठती है, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सोनिया के विकल्प के तौर पर राहुल गांधी का नाम सुझाते हैं।

राहुल के विकल्प के तौर पर उनकी नजर प्रियंका गांधी पर जाकर अटक जाती है। जबकि यह छिपी बात नहीं है कि राहुल गांधी ने चाहे जितने आक्रामक रूप से चुनाव अभियान चलाए हों, कार्यकर्ताओं में जोश भरने की कोशिश की हो, पर अभी तक उनके कामकाज का लोगों के मन पर कोई खास असर नहीं पड़ा है। ऐसे में अगर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को लगता है कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कड़ी टक्कर दे सकते हैं तो यह उनकी भूल ही कही जा सकती है। कांग्रेस को नेहरू-गांधी परिवार से बाहर निकल कर सक्षम नेतृत्व की तलाश करने का यह अच्छा मौका है, पर विचित्र है कि वह इसका लाभ उठाने की कोशिश नहीं कर रही। क्या इसकी वजह सिर्फ यह है कि परिवारवाद छोड़ कर पार्टी का नेतृत्व दूसरे हाथों में सौंपने का अब तक का उसका अनुभव अच्छा नहीं रहा है। उसके नेताओं को यह डर सताता रहता है कि इस तरह पार्टी बिखर सकती है।

कांग्रेस में अनुभवी और कुशल नेताओं की कमी नहीं है, पर उनमें महत्त्वाकांक्षाओं का टकराव भी बहुत है। इसलिए एकमात्र नेहरू-गांधी परिवार के प्रति निष्ठा ही उन्हें नियंत्रित और जोड़े रखने में मददगार साबित होती है। ऐसे में नेशनल कॉन्फ्रेंस के फारूक अब्दुल्ला की राय वाजिब कही जा सकती है कि अगर कांग्रेस को राहुल के नेतृत्व पर भरोसा है तो फिर ज्यादा ऊहापोह में रहने की क्या जरूरत, उन्हें जिम्मेदारी सौंप कर आजमा लेना चाहिए।

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