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लक्ष्य और हकीकत

सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। हर साल स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, रोगी और डॉक्टर के खराब अनुपात, विभिन्न रोगों की वजह से होने..

Author September 26, 2015 11:34 AM

सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। हर साल स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, रोगी और डॉक्टर के खराब अनुपात, विभिन्न रोगों की वजह से होने वाली मौतों, संक्रामक बीमारियों पर काबू पाने में विफलता आदि को लेकर आंकड़े आते हैं। सरकार खुद स्वास्थ्य से जुड़े तमाम पहलुओं पर अध्ययन कराती है। हर बार दावा किया जाता है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने का प्रयास किया जाएगा, मगर स्थिति बद से बदतर होती नजर आती है। सेंट्रल ब्यूरो फॉर हेल्थ इंटेलीजेंस के ताजा आंकड़े भी इसकी गवाही देते हैं। सरकारी अस्पतालों में रोगियों के अनुपात में डॉक्टरों की संख्या जरूरत से काफी कम है। मोटे तौर पर एक अस्पताल पर करीब इकसठ हजार रोगियों को स्वास्थ्य सेवाएं देने की जिम्मेदारी है। अठारह सौ तैंतीस लोगों पर एक बिस्तर है और एक एलोपैथिक डॉक्टर पर ग्यारह हजार से ज्यादा लोगों के इलाज का भार है।

राज्यवार आंकड़ों में रोगी और डॉक्टर का अनुपात कई राज्यों में काफी चिंताजनक है। स्वास्थ्य के मद में सरकारी आबंटन निहायत अपर्याप्त होने के कारण लोगों को निजी अस्पतालों की शरण लेनी पड़ती है और इलाज पर लगातार अधिक पैसा खर्च करना पड़ रहा है। सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की दयनीय स्थिति का नतीजा है कि टीबी, मस्तिष्क ज्वर, डेंगू, मलेरिया जैसी अनेक ऐसी बीमारियों पर भी काबू पाना मुश्किल बना हुआ है, जिनमें सामान्य उपचार से रोगी ठीक हो सकता है। स्वास्थ्य संबंधी जो लक्ष्य और बहुत-से देशों के साथ-साथ भारत ने भी स्वीकार किए हैं उन्हें पूरा करने में हमारी प्रगति कतई संतोषजनक नहीं है।

भारत ने इन लक्ष्यों के तहत इस महीने के अंत तक प्रसव के समय होने वाली मौतों और शिशु मृत्यु दर में तीन चौथाई तक कमी लाने का संकल्प लिया था। पर इस मंजिल से वह काफी पीछे है। इस संदर्भ में कई राज्यों के आंकड़े चेतावनी-भरे हैं। इससे जननी सुरक्षा जैसी स्वास्थ्य योजनाओं की पोल खुलती है। यह पहली बार नहीं है, जब बीमारियों पर काबू न पाए जा सकने और सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों-नर्सों आदि की कमी के तथ्य सामने आए हैं। मगर तमाम दावों के बावजूद सरकार ने कभी इस पर गंभीरता नहीं दिखाई। ऐसा भी नहीं कि प्रशिक्षित डॉक्टरों की कमी है। देश के चार सौ चिकित्सा संस्थानों से हर साल करीब सैंतालीस हजार विद्यार्थी एमबीबीएस करके निकलते हैं। उनमें से ज्यादातर निजी अस्पतालों में सेवाएं देना पसंद करते हैं।

इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि एमसीआइ यानी भारतीय चिकित्सा परिषद में पंजीकरण कराने वाले विद्यार्थियों की तादाद लगातार घट रही है। 2013 के मुकाबले 2014 में करीब आधे विद्यार्थियों ने ही पंजीकरण कराया। ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में चिकित्सा सेवाएं देने से कतराने वाले डॉक्टरों के खिलाफ कड़ा कदम उठाते हुए सरकार ने नियम बनाया कि उन्हें कम से कम एक साल ऐसे क्षेत्र में काम करना जरूरी होगा। मगर उसका कोई असर नहीं हुआ। चिकित्सा सेवा तक समूची आबादी की आसान पहुंच का सपना तो रह-रह कर दिखाया जाता है, पर इस बाबत कोई कारगर नीति या योजना नहीं दिखती।

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