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कुपोषित विकास

मुंबई हाईकोर्ट ने मंगलवार को महाराष्ट्र की फडणवीस सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि वह कुपोषण के मसले पर न खुद चिंतित है, न अदालत के आदेशों की उसे कोई फिक्र है।

Author Published on: June 21, 2017 4:32 AM
Poverty in india, Poverty Line, Poverty Line in India, Povertyसामाजिक आर्थिक सर्वेक्षण रिर्पोट के अनुसार, ‘गरीबी ने आज भी देश के तीस फीसद आबादी को अपने चंगुल में जकड़ रखा है। (रॉयटर्स फोटो)

इससे अफसोसनाक तस्वीर क्या होगी कि एक ओर देश के तेजी से विकास करने का दम भरा जा रहा है और दूसरी ओर हर साल हजारों लोगों और बच्चों की जान सिर्फ इसलिए जा रही है कि उन्हें पर्याप्त पोषणयुक्त भोजन नहीं मिल पाता है। यह हकीकत भारत के एक ऐसे राज्य के आदिवासी इलाकों की है, जिसकी गिनती देश के अपेक्षया संपन्न राज्यों में होती है। मुंबई हाईकोर्ट ने मंगलवार को महाराष्ट्र की फडणवीस सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि वह कुपोषण के मसले पर न खुद चिंतित है, न अदालत के आदेशों की उसे कोई फिक्र है। अदालत ने साफ लहजे में कहा कि महाराष्ट्र के जनजातीय इलाकों में कुपोषण से होने वाली मौतें किसानों पर मंडराते उस संकट से कम त्रासद नहीं हैं, जिसके चलते सरकार को कर्जमाफी जैसे उपाय अपनाने पड़े हैं। गौरतलब है कि मुंबई हाईकोर्ट ने करीब आठ महीने पहले इसी मसले पर राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए निर्देश दिया था कि वह आदिवासियों के कल्याण के लिए बने कानून और योजनाओं पर तुरंत अमल सुनिश्चित करके कोर्ट को बताए। लेकिन सरकार के रवैये का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इतना वक्त गुजरने के बाद अब अदालत को फिर से दो महीने के भीतर पहले के आदेशों पर अमल का निर्देश जारी करना पड़ा है।

देश की आर्थिक राजधानी के तौर पर मशहूर मुंबई से महज सौ किलोमीटर की दूरी पर स्थित नंदुरबार, धुले और मालघाट जैसे आदिवासी इलाकों में पिछले करीब डेढ़ दशक से कुपोषण से होने वाली मौतों की त्रासदी लगातार बनी हुई है। राज्य में कुपोषण के चलते हर साल ग्यारह हजार लोगों की जान जा रही है। इनमें ज्यादातर संख्या नवजात बच्चों की है, जिनकी मौत जन्म के बाद एक महीने के भीतर हो जाती है। यह हालत दरअसल बहुस्तरीय कोताही का नतीजा है। सरकारी योजनाओं पर अमल में लापरवाही और संवेदनहीनता से लेकर चिकित्सा के मोर्चे पर घोर अव्यवस्था ने हालात को ज्यादा शोचनीय बना दिया है। इस मामले पर मुंबई हाईकोर्ट में रिपोर्ट पेश करने वाले डॉ अभय बंग ने बताया कि हर साल लगभग दो हजार मेडिकल के विद्यार्थी पलायन कर दूसरे शहरों में चले जाते हैं; ग्रामीण इलाकों में डॉक्टर काम नहीं करना चाहते और सरकारी बॉन्ड के उल्लंघन पर भी उनसे जुर्माना नहीं वसूला जाता। इस वजह से राज्य सरकार को न सिर्फ नौ सौ करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है, बल्कि डॉक्टरों की अनुपलब्धता का खमियाजा सबसे ज्यादा संबंधित इलाकों के आदिवासियों को भुगतना पड़ता है।

कई अध्ययनों में ये तथ्य आ चुके हैं कि देश के चालीस से पैंतालीस फीसद बच्चे कुपोषण के शिकार हैं और हर साल लाखों बच्चे इस वजह से मौत के मुंह में चले जाते हैं। एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम से लेकर मिड-डे मील जैसी कुपोषण निवारक योजनाएं अपर्याप्त आबंटन तथा भ्रष्टाचार, दोनों की शिकार हैं, और इसलिए बेमानी साबित हो रही हैं। कुछ साल पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कुपोषण को राष्ट्रीय कलंक कहा था। लेकिन उनके दस साल के कार्यकाल में वह कलंक वैसा का वैसा बना रहा। अब भी वैसा ही बना हुआ है। जबकि हमारे संविधान के अनुच्छेद इक्कीस ने जीने की गारंटी दे रखी है।

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