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गतिरोध का चलन

धर्मांतरण के मसले पर जिस तरह पिछले हफ्ते विपक्ष ने लगातार राज्यसभा की कार्यवाही ठप रखी और प्रधानमंत्री ने यह गतिरोध दूर करने की कोशिश नहीं की, उससे एक बार फिर यही जाहिर हुआ कि हमारे राजनेता सदन में हंगामे का चलन बंद करने को लेकर गंभीर नहीं हैं। यूपीए सरकार के समय कई सत्रों […]

Author December 22, 2014 12:19 pm
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धर्मांतरण के मसले पर जिस तरह पिछले हफ्ते विपक्ष ने लगातार राज्यसभा की कार्यवाही ठप रखी और प्रधानमंत्री ने यह गतिरोध दूर करने की कोशिश नहीं की, उससे एक बार फिर यही जाहिर हुआ कि हमारे राजनेता सदन में हंगामे का चलन बंद करने को लेकर गंभीर नहीं हैं। यूपीए सरकार के समय कई सत्रों के हंगामे की भेंट चढ़ जाने की वजह से हुए नुकसान से भी कोई सबक लेने की जरूरत नहीं समझी गई। विपक्ष की मांग थी कि प्रधानमंत्री सदन में आकर धर्मांतरण के मुद्दे पर बयान दें, मगर वे लगातार इससे बचते रहे। नियम के मुताबिक प्रधानमंत्री पर इसके लिए दबाव नहीं बनाया जा सकता, मगर उनसे नैतिक अपेक्षा की जा रही थी कि इस मसले पर अपने विचार प्रकट करें। पिछले कुछ दिनों में जिस तरह उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में धर्मांतरण और घर वापसी के कार्यक्रम आयोजित किए गए और उनमें भाजपा के बड़े नेताओं की भूमिका स्पष्ट देखी गई उससे उचित ही पंथनिरपेक्ष लोगों में क्षोभ पैदा हुआ। जगह-जगह धर्मांतरण के कार्यक्रम घोषित करके उसके लिए धन जुटाया जा रहा है, इससे सामाजिक समरसता के खतरे में पड़ने का अंदेशा गहराता गया है। अल्पसंख्यक समुदायों में भय घर कर गया है। ऐसे में सरकार का मुखिया होने के नाते विपक्ष की प्रधानमंत्री का रुख जानने की जिद अनुचित भी नहीं लगती। यों इस मुद्दे पर गृहमंत्री भी विपक्ष के सवालों का जवाब दे सकते थे। मगर इसके लिए जरूरी था कि बहस लोकतंत्र के दायरे में हो। विपक्ष ने इसे अस्वीकार कर दिया। इसके चलते लोकसभा में पारित अनेक महत्त्वपूर्ण विधेयक राज्यसभा में मंजूरी की बाट जोहते रह गए। अब भाजपा का कहना है कि विपक्ष बेवजह प्रधानमंत्री के बयान को तूल दे रहा है। चूंकि राज्यसभा में उसका संख्याबल अधिक है इसलिए वह नाहक वहां सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है। मगर धर्मांतरण के मसले को इस तरह दरकिनार कर प्रधानमंत्री को अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश नहीं करनी चाहिए थी।

जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी तो उन्होंने दावा किया था कि हर बात के लिए वे जवाबदेह होंगे, उनसे कभी भी सीधे संपर्क किया जा सकता है। फिर धर्मांतरण के मसले पर उन्हें कुछ देर राज्यसभा में भी बयान देने से क्यों गुरेज करना चाहिए था। अगर वे सचमुच घर वापसी और धर्मांतरण संबंधी कार्यक्रमों को लोकतंत्र के अनुरूप नहीं मानते, सामाजिक विद्वेष को रोकने के प्रति गंभीर हैं, तो उन्हें संसदीय कार्यवाही की नियमावली की क्यों फिक्र होनी चाहिए थी। अगर विपक्ष की जिद के चलते संसद का कामकाज बाधित रहा, कई महत्त्वपूर्ण विधेयक पारित होने से रह गए तो इसमें प्रधानमंत्री की जिद को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अगर वे सदन को आश्वस्त कर देते कि संबंधित मुद्दे पर वे बहस का सम्मान करते हैं, तो चाहे गृहमंत्री या फिर दूसरे मंत्री जवाब देने को आते, बहस को आगे बढ़ाने में शायद कोई अड़चन नहीं आती। इस मुद्दे पर लोकसभा में कोई हंगामा न होने की नजीर नहीं दी जा सकती। वहां विपक्ष एक तरह से अनुपस्थित है। वह राज्यसभा में है। इसलिए अगर वह वहां इस पर बहस करना चाहता था तो अनुचित क्या था। क्या लोकसभा में विपक्ष की उपस्थिति मजबूत होती और वह इस पर प्रधानमंत्री के बयान की मांग करता तो वे इसी तरह बचने की कोशिश करते! उनके न बोलने से स्वाभाविक ही यह संकेत गया कि धर्मांतरण रोकने को लेकर उनकी सरकार गंभीर नहीं है।

 

 

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