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संपादकीय: सकारात्मक पहल

भाजपा की राज्य इकाई भी नहीं चाहती थी कि सैन्य अभियान रोक दिया जाए। यह दिलचस्प है कि राज्य के जो भाजपा नेता कल तक सैन्य कार्रवाई स्थगित रखने की महबूबा मुफ्ती की मांग की आलोचना करते नहीं थकते थे, अब उनके सुर बदल गए हैं।

Author May 18, 2018 3:43 AM
सेना के जवानों की फाइल फोटो।

गुरुवार से शुरू हुए रमजान के दौरान जम्मू-कश्मीर में सैन्य अभियान स्थगित रखने का केंद्र का फैसला एक सही कदम है। इसके साथ यह शर्त या सावधानी जरूर जुड़ी है कि अगर आतंकवादियों की तरफ से कोई हमला होता है, तो जवाबी कार्रवाई अवश्य की जाएगी। केंद्र के इस फैसले का मकसद जाहिर है। रमजान का महीना मुसलिम समुदाय के लिए बहुत पवित्र माना जाता है। इन दिनों वे दिन भर रोजा यानी उपवास रखते हैं और इस सिलसिले की परिणति ईद के त्योहार में होती है जो उनका सबसे अहम त्योहार है। रमजान की इस अहमियत को देखते हुए ही पिछले दिनों राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने एक सर्वदलीय बैठक बुलाई थी, जिसमें केंद्र से सैन्य अभियान पर रोक लगाने की मांग उठी। भाजपा को छोड़ कर, राज्य में आधार रखने वाली बाकी सब पार्टियों ने एकमत से प्रस्ताव पारित कर केंद्र से एकतरफा संघर्ष विराम का अनुरोध किया था। लिहाजा, स्वाभाविक ही सबसे पहले महबूबा मुफ्ती ने केंद्र के इस निर्णय का स्वागत किया। पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने भी इस घोषणा का स्वागत करते हुए कहा है कि अगर उग्रवादी इसके अनुरूप व्यवहार नहीं करते, तो वे जनता के दुश्मन माने जाएंगे।

दूसरी पार्टियों और सिविल सोसाइटी ने भी केंद्र के फैसले का स्वागत किया है, लेकिन उनमें से कइयों ने यह शंका भी प्रकट की है कि क्या इस घोषणा का असर जमीनी स्तर पर दिखेगा? अलगाववादियों ने फिलहाल चुप्पी साध रखी है। बहरहाल, केंद्र के लिए सैन्य कार्रवाई रोक देने का निर्णय करना आसान नहीं रहा होगा, क्योंकि सेना इसके पक्ष में नहीं थी, रक्षा मंत्रालय भी सहमत नहीं था। भाजपा की राज्य इकाई भी नहीं चाहती थी कि सैन्य अभियान रोक दिया जाए। यह दिलचस्प है कि राज्य के जो भाजपा नेता कल तक सैन्य कार्रवाई स्थगित रखने की महबूबा मुफ्ती की मांग की आलोचना करते नहीं थकते थे, अब उनके सुर बदल गए हैं। अब वे केंद्र के फैसले की तारीफ करते हुए इससे सकारात्मक बदलाव आने की उम्मीद जता रहे हैं! यह पहला मौका नहीं है जब केंद्र सरकार ने एकतरफा संघर्ष विराम की घोषणा की हो। दिसंबर 2000 में भी रमजान के समय घाटी में सैन्य अभियान रोक दिया गया था। वह भी राजग की ही सरकार थी, और तब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। वाजपेयी सरकार ने एक और पहल की थी, जिसके तहत कश्मीर समस्या के शांतिपूर्ण समाधान के लिए राज्य के सभी समूहों से संवाद का सिलसिला चला था। इसके साथ ही ‘इंसानियत, जम्हूरियत, कश्मीरियत’ के वाजपेयी के नारे ने भी घाटी के लोगों के मन में एक नई उम्मीद जगाई थी। उस विरासत को आगे बढ़ाने की जरूरत है।

विडंबना यह है कि भाजपा इस मामले में संजीदा नहीं दिखती। पीडीपी और भाजपा की साझा सरकार बनी, तो इसे कुछ लोगों ने ‘विरोधाभासों का सामंजस्य’ कहा था। पर इसे ऐतिहासिक अवसर के रूप में भी देखा गया- कि पीडीपी और भाजपा के मिलन से जहां जम्मू और कश्मीर के बीच की भावनात्मक खाई पाटी जा सकेगी, वहीं यह गठबंधन सांप्रदायिक सौहार्द का भी संदेशवाहक हो सकेगा। कश्मीर समस्या के स्थायी व शांतिपूर्ण समाधान के लिए ‘गठबंधन का एजेंडा’ भी घोषित किया गया था। लेकिन उस एजेंडे को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है और साझा सरकार बनने के समय किए गए वायदे बिसरा दिए गए हैं। केंद्र ने एक वार्ताकार जरूर नियुक्त कर रखा है, पर उनकी कोई उपलब्धि अभी तक सामने नहीं आई है। यह मौका उन वायदों को फिर से याद करने का भी है जो साझा सरकार के गठन के समय किए गए थे।

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