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संपादकीय: सियासत और संवेदना

उन्नाव और कठुआ की घटनाओं में आरोपियों को बचाने की हर कोशिश की गई। उत्तर प्रदेश पुलिस ने आरोपी विधायक के पक्ष में उतर कर खुलेआम पीड़ित पक्ष को प्रताड़ित किया। उसमें पीड़िता के पिता की मौत तक हो गई।

Author April 16, 2018 3:06 AM
केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडेकर ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर किया हमला

जब संवेदनशील मसलों पर भी वोट भुनाने की राजनीति होने लगे तो वह लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक स्थिति होती है। मगर हमारे राजनेता शायद इस बात को जानबूझ कर भुलाते गए हैं कि कुछ मसले आपस में मिल-बैठ कर, आंतरिक अनुशासन और सामाजिक समरसता बनाए रख कर भी हल किए जाते हैं। उन्नाव और कठुआ बलात्कार मामलों को लेकर जिस तरह सत्ता पक्ष और विपक्ष गड़े मुर्दे उखाड़ने और खुद को पाक-साफ साबित करने का प्रयास कर रहे हैं, उसमें उस प्रवृत्ति पर नकेल कसने का संकल्प कहीं नहीं है जिसके चलते समाज में भय और असुरक्षा का माहौल बनता जा रहा है। इन दोनों घटनाओं के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने आधी रात को मोबत्तियां लेकर इंडिया गेट पर रैली निकाली थी। अब उनके जवाब में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडेकर मैदान में उतर आए हैं। उन्होंने निर्भया कांड से लेकर उसके बाद की तमाम ऐसी घटनाओं पर कांग्रेस को निशाने पर लिया है। इस तरह कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दल और भाजपा एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने में जुट गए हैं।

उन्नाव और कठुआ की घटनाओं में आरोपियों को बचाने की हर कोशिश की गई। उत्तर प्रदेश पुलिस ने आरोपी विधायक के पक्ष में उतर कर खुलेआम पीड़ित पक्ष को प्रताड़ित किया। उसमें पीड़िता के पिता की मौत तक हो गई। इसी तरह कठुआ मामले में आरोपियों को बचाने के लिए भाजपा और हिंदुत्ववादी संगठनों के नेताओं की अगुआई में विरोध प्रदर्शन किए गए। लिहाजा इन घटनाओं की जांच और कार्रवाई में खासा वक्त लग गया। लोगों में रोष इसी बात को लेकर है कि जब सत्ता पक्ष से जुड़ा कोई व्यक्ति किसी जघन्य अपराध में शामिल होता है तो स्थानीय प्रशासन से लेकर पार्टी स्तर तक उसे बचाने का प्रयास होने लगता है। घटनाओं से जुड़े तथ्यों को मिटाने या तोड़-मरोड़ कर पेश करने का प्रयास होता है। रसूख वाले लोगों को सजा की दर वैसे भी बहुत कम है। इसलिए जब भी ऐसी कोई घटना होती है, जिसमें कोई जनप्रतिनिधि शामिल होता है, तो उसके विपक्षी दल लोगों की इस नाराजगी को भुनाने का प्रयास करने लगते हैं।

यह समझने की जरूरत है कि आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों की कोई पार्टी नहीं होती और न वे किसी एक दल के प्रति प्रतिबद्ध होते हैं। वे अपनी सुरक्षा और लोभ को भुनाने के लिए राजनीतिक दलों की शरण में जाते हैं। ऐसे लोगों को पहचानना और अनुशासित करना संबंधित राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी होती है। अगर वे ऐसा नहीं कर पाते, तो यह उनकी विफलता मानी जाती है। जब कोई सांसद, विधायक या कार्यकर्ता जघन्य या संज्ञेय अपराध करता है तो निस्संदेह उससे पार्टी की बदनामी होती है। इसलिए पार्टियां उसे बचाने का प्रयास करती देखी जाती हैं। पर यह नहीं भूलना चाहिए कि आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों का बचाव करने से पार्टियों की बदनामी उससे भी ज्यादा होती है। अगर किसी व्यक्ति पर गंभीर आरोप लगता है, तो सबसे पहले पार्टी को उसकी जांच कराने की मांग करनी चाहिए, फैसला आने तक उसे पार्टी की जिम्मेदारियों से हटा देना चाहिए। तभी कार्यकर्ताओं में अनुशासन का भाव आएगा। मगर विचित्र है कि पार्टियां उनके खिलाफ सख्ती बरतने के बजाय उन्हें बचाने का प्रयास करती हैं। इसके चलते न तो उनकी आपराधिक मानसिकता को बदलने में कामयाबी मिल पाती है और न समाज में ऐसी घटनाओं पर काबू पाने का भरोसा बन पाता है।

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