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हिंसा की कड़ियां

शनिवार को देर रात आरएसएस के एक सदस्य की हत्या कर दी गई, जिसमें घटना के आरोपी एक कुख्यात अपराधी और उसके चार अन्य साथियों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है।

Author August 1, 2017 5:38 AM
केरल में वामपंथी गठबंधन की रैली में पार्टी कार्यकर्ता। (एजेंसी फोटो)

 

केरल में माकपा और आरएसएस के कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक टकराव लंबे समय से जारी है। दोनों पक्षों के सैकड़ों कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है। लेकिन हर घटना के बाद इसका कोई हल निकालने के बजाय एक दूसरे पर महज आरोप-प्रत्यारोप के दौर चलते हैं। तिरुवनंतपुरम में शनिवार को देर रात आरएसएस के एक सदस्य की हत्या कर दी गई, जिसमें घटना के आरोपी एक कुख्यात अपराधी और उसके चार अन्य साथियों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। हो सकता है कि इस हत्या के पीछे किसी आम आपराधिक गिरोह का हाथ हो और जांच के बाद सही तथ्य सामने आएंगे। लेकिन केरल में माकपा और आरएसएस के बीच जिस तरह का टकराव जारी है, उसमें ऐसी कोई भी घटना एक दूसरे को घेरने का जरिया भी बन जाती है।

स्वाभाविक ही केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने सख्त लहजे में कहा कि लोकतंत्र में राजनीतिक हिंसा स्वीकार्य नहीं है। उनकी इस राय से शायद ही कोई इत्तिफाक न रखे। लेकिन सच यह है कि पिछले करीब पांच दशक से केरल में माकपा और आरएसएस के बीच जारी खूनी टकराव का सिलसिला अब एक भयानक मोड़ पर आ पहुंचा है। हालत यह है कि इस होड़ में अफवाहों, सोशल मीडिया या वाट्स ऐप पर भड़काऊ संदेश, बयान या फोटो और वीडियो का भी सहारा लिया जाता है। वर्चस्व की इस लड़ाई में आए दिन कभी माकपा के किसी कार्यकर्ता की हत्या कर दी जाती है, तो कभी आरएसएस का कोई सदस्य मारा जाता है। दोनों ही पक्ष अब तक अपने दो सौ से तीन सौ कार्यकर्ताओं के मारे जाने का दावा करते हैं और हर बार ऐसी वारदात के बाद एक दूसरे को जिम्मेवार ठहराते हैं। मगर लोकतांत्रिक तरीके से इसका कोई स्थायी हल निकालने की कोशिश नहीं की जाती। यही वजह है कि हिंसा या हत्या की हर घटना अमूमन बदले की कार्रवाई को न्योता देती है, और फिर त्रासद सिलसिला चलता रहता है!

किसी लोकतंत्र में राजनीतिक वर्चस्व की होड़ की इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है कि कुछ समय पहले उज्जैन में आरएसएस के एक स्थानीय प्रचार प्रमुख ने एक सभा को संबोधित करते हुए यह फतवा जारी कर दिया था कि जो भी केरल के मुख्यमंत्री विजयन का सिर काट लाएगा, उसे मैं एक करोड़ रुपए दूंगा। यह अलग बात है कि बवाल मचने के बाद आरएसएस ने खुद को उस बयान से अलग कर लिया था। पहले ही जहां माकपा और आरएसएस के बीच हिंसा एक बड़ी समस्या बनी हुई हो, वहां ऐसे बयान किस तरह का असर डालते होंगे, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। लगभग दस महीने पहले मंदिर परिसरों में हथियार छिपाने और आरएसएस की शाखाओं में इसका प्रशिक्षण देने के आरोप सामने आने के बाद केरल में देवोस्वोम विभाग ने इस पर पाबंदी लगाने का प्रस्ताव रखा था। वहीं माकपा पर भी सुनियोजित तरीके से आरएसएस के कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंसा करने की शिकायतें आम रही हैं। सवाल है कि सबसे ज्यादा साक्षरता वाला राज्य केरल अगर आज वैचारिक लड़ाई का खूनी अखाड़ा बनता जा रहा है तो भविष्य में यह कैसा समाज रचेगा! यह ध्यान रखने की बात है कि लोकतांत्रिक तरीकों को ताक पर रख कर हिंसा के जरिए कायम किए गए राजनीतिक वर्चस्व की उम्र बहुत ज्यादा नहीं होती।

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