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अविश्वास की खाई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भरोसा दिलाया है कि संविधान में दी गई धार्मिक आजादी के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा, सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने या हिंसा भड़काने की घटनाएं बर्दाश्त नहीं की जाएंगी। एक समाचार एजेंसी को दिए साक्षात्कार में उन्होंने यह भी कहा कि हमारे देश में हर धार्मिक समुदाय को समान अधिकार हासिल […]

Author June 3, 2015 5:53 PM

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भरोसा दिलाया है कि संविधान में दी गई धार्मिक आजादी के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा, सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने या हिंसा भड़काने की घटनाएं बर्दाश्त नहीं की जाएंगी। एक समाचार एजेंसी को दिए साक्षात्कार में उन्होंने यह भी कहा कि हमारे देश में हर धार्मिक समुदाय को समान अधिकार हासिल हैं; यह समानता न केवल कानून के समक्ष है बल्कि समाज में भी है। प्रधानमंत्री का यह दो टूक संदेश स्वागत-योग्य है। पर क्या केवल संदेश काफी है? लोकसभा चुनावों से कुछ महीने पहले से ‘लव जेहाद’ के विरोध के नाम पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को हवा देने वाले कौन थे? मुजफ्फरनगर दंगों के दो आरोपियों का सार्वजनिक अभिनंदन करने में भाजपा को कोई हिचक नहीं हुई थी। चुनाव के बाद भी, पिछले एक साल का अनुभव अच्छा नहीं रहा है। कभी मुसलिम समुदाय तो कभी ईसाई समुदाय को निशाना बना कर आपत्तिजनक बयान देने वालों में केंद्र के कई मंत्री भी शामिल थे। दिल्ली में एक के बाद एक कई गिरजाघरों पर हमले हुए। मध्यप्रदेश में भी दो गिरजाघरों को निशाना बनाया गया।

जब ऐसी घटनाओं पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने चिंता जताई, तब प्रधानमंत्री को लगा कि दुनिया भर में देश की छवि पर आंच आ रही है। फिर उन्हें कुछ चेतावनी देने की जरूरत महसूस हुई। पिछले साल पंद्रह अगस्त को लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि अगर देश को तेजी से विकास करना है तो कम से कम दस साल के लिए लोग जाति, धर्म के झगड़े भूल जाएं। उनके इस संदेश के बावजूद कभी देश को हिंदू राष्ट्र बनाने के बयान दिए जाते रहे तो कभी ‘घर वापसी’ की मुहिम चलाई गई। इस सबसे समाज की मानसिकता बिगड़ती है। फिर इसका असर किसी को धार्मिक भेदभाव बरतते हुए नौकरी न देने के रूप में दिखाई पड़ता है तो कहीं सांप्रदायिक तनाव की घटना में। हरियाणा के बल्लभगढ़ के अटाली गांव में हमेशा पड़ोसी की तरह रहते आए दो समुदायों के बीच इन दिनों अविश्वास की खाई खुद गई है। गांव के मुसलिम समुदाय के लोग कुछ दिनों से बल्लभगढ़ शहर के पुलिस थाने में शरण लिए हुए हैं। करीब एक हफ्ते पहले उन पर हथियारों से लैस भीड़ ने हमला किया, जिसमें पंद्रह लोग घायल हो गए। करीब बीस घर भी जला दिए गए। खबर है कि झगड़ा मस्जिद के निर्माण को लेकर शुरू हुआ। गांव के जाट समुदाय के लोग इस बात से खफा हैं कि मस्जिद का निर्माण मंदिर के निकट क्यों शुरू किया गया।

दूसरे समुदाय का कहना है कि मस्जिद बनाने के लिए जो जगह चुनी गई वह वक्फ बोर्ड की है, अदालत ने भी इस पर मुहर लगाई है, इसलिए दूसरों के एतराज का कोई मतलब नहीं है। लेकिन यह विवाद शायद अब तक सुलझ गया होता, अगर पुलिस हमलावरों के खिलाफ कार्रवाई के लिए तैयार हो जाती। पुलिस चाहती है कि थाने में शरण लिए हुए लोग गांव लौट जाएं, पर हमले के आरोपियों में से किसी की भी गिरफ्तारी उसने अब तक नहीं की है। पंद्रह लोगों के घायल होने, बीस घर जला दिए जाने और दो सौ से ज्यादा लोगों के घर छोड़ कर भागने को मजबूर होने के बाद भी राज्य सरकार निष्क्रिय बनी हुई है। क्या यह उदासीनता इसलिए है कि आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई से उसे राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है? हमारे समाज में जहां सौहार्द के अनगिनत उदाहरण मिलेंगे, वहीं तनाव के भी कुछ बहाने मौजूद रहते हैं। सवाल है कि किस बात को प्रोत्साहन मिलता है। सौहार्द को न बिगड़ने देने, उसे और मजबूती देने का पहला तकाजा यह है कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की सियासत बंद हो।

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