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जनसत्ता संपादकीय : बेनामी पर नजर

जमीन-जायदाद में काले धन के प्रवाह को रोकने के मकसद से तैयार बेनामी लेन-देन निषेध संशोधन कानून से कुछ बेहतर नतीजों की उम्मीद की जा रही है।

Author नई दिल्ली | August 18, 2016 04:12 am
केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली। (पीटीआई फाइल फोटो)

जमीन-जायदाद में काले धन के प्रवाह को रोकने के मकसद से तैयार बेनामी लेन-देन निषेध संशोधन कानून से कुछ बेहतर नतीजों की उम्मीद की जा रही है। इसके तहत बेनामी संपत्ति खरीदने वालों को सात साल तक की सजा और संपत्ति के बाजार मूल्य के पच्चीस फीसद तक जुर्माने का प्रावधान है। इसमें लेन-देन में गलत जानकारी देने वालों के खिलाफ भी कड़े दंड और जुर्माने का प्रावधान किया गया है। हालांकि यह कानून पुराना है, इसमें महज दंडात्मक प्रावधान कड़े किए गए हैं। यानी पहले से कानून होने के बावजूद बेनामी संपत्ति पर नजर रखना मुश्किल बना हुआ था। ऐसे में स्वाभाविक ही सवाल उठता है कि नए कानून के जरिए इस मामले में कितनी कड़ाई बरती जा सकेगी। छिपी बात नहीं है कि काली कमाई छिपाने के लिए बहुत सारे नेता, नौकरशाह और कारोबारी रीयल एस्टेट में चोरी से पैसा लगाते हैं।

जमीन, मकान, दुकान आदि वे सीधे अपने नाम से न खरीद कर दूसरे किसी नाम से पंजीकृत करवाते हैं। इसमें प्राय: वे अपने परिजनों और रिश्तेदारों के नामों का इस्तेमाल करते हैं। कई लोग अपने नजदीकी लोगों के नाम से भी ऐसी संपत्ति खरीद लेते हैं। निजी भवन निर्माताओं के बनाए भवन या फिर हाउसिंग सोसाइटियां इसके लिए सबसे मुफीद साबित होती हैं। इस तरह रीयल एस्टेट में काले धन के प्रवाह का नतीजा यह हुआ है कि मकानों की कीमतें आसमान छूने लगी हैं और सामान्य आय वर्ग के जरूरतमंद लोगों के लिए घर खरीदना सपने जैसा होता गया है। काली कमाई वालों के पास अलग-अलग शहरों में, यहां तक कि एक ही शहर में कई मकान हैं। जब तक इस प्रवृत्ति पर अंकुश नहीं लगता, हर किसी को घर उपलब्ध कराना मुश्किल बना रहेगा।

कायदे से कोई व्यक्ति अपने नाम से एक शहर में एक से अधिक मकान नहीं खरीद सकता। इस नियम की गली निकाल कर लोग अपनी पत्नी या पति और बेटे-बेटियों के नाम मकान खरीदने लगे। मकान खरीदना निवेश का अच्छा जरिया माना जाता है, इसलिए भी लोग इस तरफ ज्यादा आकर्षित होते हैं। यह भी उजागर तथ्य है कि काली कमाई करने वाले बहुत सारे लोगों ने मकानों के अलावा मॉलों, बाजारों आदि में पैसा लगाना शुरू कर दिया है। मगर हैरानी की बात है कि इस तरह अपनी नाजायज कमाई छिपाने वाले बहुत कम लोगों पर नजर रखी जा पाती है। कानून के मुताबिक हर मकान, दुकान, भूखंड आदि का पंजीकरण कराना अनिवार्य है। इसके लिए सरकार को शुल्क भी देना पड़ता है। आजकल जमीन-जायदाद के पंजीकरण में कंप्यूटर का इस्तेमाल होता है।

लगभग सभी राज्यों में हर भूखंड का ब्योरा इंटरनेट पर उपलब्ध है। फिर भी समझ से परे है कि लोग एक नाम से कई मकान खरीद या बेनामी संपत्ति खड़ी कर लेते हैं और पकड़ में नहीं आते। सिर्फ उन्हीं लोगों पर कोई कार्रवाई हो पाती है, जिनके खिलाफ आस-पड़ोस या हाउसिंग सोसाइटियों आदि के लोग शिकायत दर्ज कराते हैं। दूसरे अनेक देशों में नियम है कि मकान केवल वही खरीद सकता है, जिसे उसमें रहना है। किराए पर चढ़ाने के लिए खरीदने की प्रथा नहीं है। इसलिए वहां हर व्यक्ति के पास अपना मकान है। भारत में ऐसा इसलिए नहीं हो पाता कि जिन लोगों पर नाजायज संपत्ति पर नजर रखने की जिम्मेदारी है, वही इसका सहारा लेते देखे जाते हैं। ऐसे में नया बेनामी कानून कितना प्रभावी साबित होगा, कहना मुश्किल है।

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