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जनसत्ता संपादकीय : कश्मीर की पीर

जब भी कश्मीर के किसी मसले पर भारत सरकार कोई कड़ा रुख अख्तियार करती है, पाकिस्तान को परेशानी होने लगती है। पिछले एक महीने से कश्मीर अशांत है।
Author नई दिल्ली | August 15, 2016 04:36 am
अच्छी बात है कि देर से ही सही, केंद्र सरकार ने कश्मीर में अशांति का हल ढूंढ़ने के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाई और छर्रे वाली बंदूक के इस्तेमाल जैसे मसलों पर सकारात्मक कदम उठाने का फैसला किया।

जब भी कश्मीर के किसी मसले पर भारत सरकार कोई कड़ा रुख अख्तियार करती है, पाकिस्तान को परेशानी होने लगती है। पिछले एक महीने से कश्मीर अशांत है। घाटी के लोग कर्फ्यू और हिंसा का सामना कर रहे हैं। इस समस्या से निपटने के लिए प्रधानमंत्री ने सर्वदलीय बैठक बुलाई और उसमें पाक अधिकृत कश्मीर को लेकर कड़ी बात कह दी तो पाकिस्तान असहज हो उठा। पाकिस्तान के जश्ने-आजादी के मौके पर भारत में वहां के उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने पत्रकारों से कह डाला कि वे कश्मीर की आजादी की मांग करने वाले नौजवानों की तारीफ करते हैं।

उधर संघर्ष विराम का उल्लंघन करते हुए कश्मीर की सीमा पर पाकिस्तान की फौज ने गोलीबारी शुरू कर दी। इसके उलट पाकिस्तान सरकार ने फिर से कश्मीर समस्या पर बातचीत की प्रक्रिया आगे बढ़ाने में दिलचस्पी दिखाई है। ऐसे विरोधाभासी कदम पाकिस्तान की तरफ से उठाए ही जाते रहे हैं। भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त ऐसे मौकों पर रंज पैदा करने के लिए अक्सर कुछ न कुछ कहते या करते रहे हैं। हुर्रियत नेताओं से नजदीकी कायम रखते हैं। हालांकि फिलवक्त कश्मीर में जो स्थिति है, वह भारत का अंदरूनी मामला है। मगर पाकिस्तान ऐसे मौकों का फायदा उठाने से बाज नहीं आता।

एक तरफ तो वह ऐसा दिखाने की कोशिश करता है कि वह दोनों देशों के बीच मनमुटाव दूर करने को लेकर संजीदा है, मगर जब बात किसी नतीजे की तरफ बढ़ती दिखती है तो वह कश्मीर का मुद्दा उठा कर सारे प्रयासों पर पानी फेर देता है। कश्मीर में अमन उसे पसंद नहीं। जिस चरमपंथी बुरहान वानी के मारे जाने पर गुमराह कश्मीरी युवक आंदोलित हैं, उन्हें उकसा कर पाकिस्तान आखिर क्या हासिल करना चाहता है, छिपा नहीं। कश्मीर में आजादी की मांग उठा रहे इन नौजवानों का हौसला बुलंद करने वाला बयान देकर अब्दुल बासित ने एक बार फिर यही जाहिर किया है कि पाकिस्तान की दिलचस्पी आतंकवाद खत्म करने में कतई नहीं, भारत को परेशान करने में अधिक है।

अच्छी बात है कि देर से ही सही, केंद्र सरकार ने कश्मीर में अशांति का हल ढूंढ़ने के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाई और छर्रे वाली बंदूक के इस्तेमाल जैसे मसलों पर सकारात्मक कदम उठाने का फैसला किया। कश्मीरी लोगों की समस्याओं की जानकारी लेने के लिए एक प्रतिनिधिमंडल भेजने पर भी सहमति बनी। यूपीए सरकार के समय सलाहकार मंडल के कश्मीरी लोगों की समस्याएं सुनने और उसके मुताबिक कदम उठाने के सुझावों के कुछ सकारात्मक नतीजे दिखे थे। दरअसल, केंद्र को कश्मीर से दूरी बना कर या सिर्फ फौज की ताकत के बल पर वहां अमन कायम करने के बारे में नहीं सोचना चाहिए।

वहां के लोगों की तकलीफों और जरूरतों को समझने और दूर करने के प्रयासों से ही उनका भरोसा जीता जा सकता है। कश्मीर में उस तरह रोजगार के अवसर नहीं हैं, जैसे दूसरे अनेक राज्यों में हैं। इसलिए वहां के युवाओं के गुमराह होने की गुंजाइश ज्यादा रहती है। ऊपर से पाकिस्तान और कट्टरपंथी धार्मिक नेताओं के उकसावे में आकर वे छोटी-छोटी बातों पर हाथ में पत्थर उठा लेते हैं। ऐसे में किस तरह कश्मीर में सकारात्मक माहौल बने और भारत के प्रति वहां के युवाओं में पैदा हुई नफरत को कैसे मिटाया जा सके इसके लिए उपाय सोचने की जरूरत है। पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आने वाला। मगर भारत सरकार को धैर्य और विवेक से काम लेते हुए कश्मीर में अपने शांति प्रयासों को आगे बढ़ाने की जरूरत है।

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