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बोलती लाशें

संविधान का अनुच्छेद-21 सिर्फ जीवित व्यक्ति को ही गरिमा और सम्मान के साथ जीने का अधिकार नहीं देता, बल्कि मृत व्यक्ति को भी वह समान रूप से यह अधिकार प्रदान करता है। शवों की दुर्गति से विचलित मानवाधिकार आयोग ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मृतकों के अधिकार और सम्मान की रक्षा के लिए कानून बनाने का सुझाव दिया है।

प्रयागराज के स्थानीय लोगों के अनुसार गंगा किनारे रेत में करीब चार-पांच सौ शव गाड़े गए हैं। (फोटो – पीटीआई)

गंगा में बड़ी संख्या में बहते शव किसी को भी झकझोर सकते हैं। हाल में उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार तक गंगा में ऐसे शव देखने को मिले। गाजियाबाद से लेकर कन्नौज, उन्नाव, कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी, गाजीपुर, बलिया जैसे जिलों से ये शव बहते आ रहे हैं। बिहार में भी कई जगहों से ऐसी खबरें हैं। जाहिर है, ये शव उन शहरी या ग्रामीण इलाकों से ही नदी किनारे ऊपर ही ऊपर दफनाए या बहाए गए होंगे जो गंगा किनारे पड़ते हैं। कफन में लिपटी लाशें अगर बह रही हों, किनारे लग रही हों, अधजली हों, क्षत-विक्षत हो चुकी हों, जानवर नोंच रहे हों, तो इससे ज्यादा वीभत्स क्या हो सकता है! शवों को इस तरह बहाने-दफनाने की घटनाएं मीडिया में आने के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इसका संज्ञान लिया। उत्तर प्रदेश और बिहार सरकार को नोटिस जारी किए। आयोग ने जो सवाल पूछे और चिंता जताई, वह तो ठीक है ही, लेकिन शवों की गरिमा और मानव अधिकारों का जो मुद्दा उठाया, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

गौरतलब है कि पिछले हफ्ते बिहार के बक्सर जिले के चौसा में ऐसे ही इकहत्तर शवों को पोस्टमार्टम के बाद दफनाने की बात सामने आई थी। उत्तर प्रदेश में गंगा किनारे पड़ने वाले जिलों के हालात तो और रोंगटे खड़े देने वाले हैं। कन्नौज में गंगा किनारे साढ़े तीन सौ से ज्यादा, उन्नाव में नौ सौ से ज्यादा, गाजीपुर में तीन सौ, कानपुर में चार सौ से ज्यादा शव नदी किनारे दफन मिले। सवाल है कि हाल में ही अचानक ऐसा क्यों होने लगा? माना जा रहा है कि ये शव उन लोगों के हैं जो कोरोना संक्रमित थे और इनके परिजनों की हैसियत अंतिम संस्कार का खर्चा उठाने की भी नहीं थी। कोरोना संक्रमितों के अंतिम संस्कार के लिए श्मशानों में जिस तरह से लूटखसोट मची है, मोटी रकम ऐंठी जा रही है और घंटों कतार में लगना पड़ रहा है, वह किसी से छिपा नहीं है। दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह कि जिन जिलों में यह सब देखने को मिल रहा है, वे महामारी की चपेट में हैं।

भले सरकारें कितने दावे क्यों न करती रहें कि ग्रामीण इलाकों में हालात काबू में हैं, इलाज के सारे बंदोबस्त हैं, लेकिन लाशों के ये ढेर असलियत उजागर करने के लिए काफी हैं। अब इसमें ज्यादा शक नहीं बचा कि संक्रमण की जांच, इलाज से लेकर अंतिम संस्कार तक में सरकारों ने जो लापरवाही दिखाई, ये शव उसी का नतीजा हैं।

शवों की दुर्गति से विचलित मानवाधिकार आयोग ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मृतकों के अधिकार और सम्मान की रक्षा के लिए कानून बनाने का सुझाव दिया है। आयोग ने कहा कि शवों का सामूहिक अंतिम संस्कार या उन्हें सामूहिक रूप से दफनाना विधिसम्मत नहीं है, क्योंकि यह किसी भी मृतक के सम्मान और अधिकार का उल्लंघन है। लेकिन सरकारों को इससे कहां मतलब है! कहना बड़ा आसान है कि जो चला गया, वह मुक्ति पा गया। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि ये शव ऐसे कठोर सवाल भी छोड़ गए हैं जिनका जवाब एक न एक दिन सरकारों को देना ही पड़ेगा।

संविधान का अनुच्छेद-21 सिर्फ जीवित व्यक्ति को ही गरिमा और सम्मान के साथ जीने का अधिकार नहीं देता, बल्कि मृत व्यक्ति को भी वह समान रूप से यह अधिकार प्रदान करता है। मृतक के अधिकारों और गरिमा की रक्षा राज्य का कर्तव्य है। लेकिन ऐसा लगता है कि हमारी सरकारें निष्ठुर हैं। कहते हैं लाशें नहीं बोलतीं, लेकिन आज लाशें ही बोल रही हैं।

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