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जनसत्ता संपादकीय : पानी का प्रबंध

करीब तीन साल पहले खबर आई थी कि राजस्थान का एक चौथाई हिस्सा पूरी तरह रेगिस्तान में तब्दील हो चुका है।

Author नई दिल्ली | August 25, 2016 5:56 AM
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कुछ समय पहले महाराष्ट्र के एक बड़े इलाके में सूखे की वजह से पीने तक के पानी के लिए हाहाकार मच गया था। तब अरबों रुपए खर्च कर पानी से भरी रेलगाड़ियां भेजी गर्इं। तात्कालिक तौर पर पानी के अभाव से उपजी समस्या पर तो आंशिक रूप से काबू पा लिया गया, लेकिन इससे निपटने की कोई टिकाऊ योजना अब भी नहीं दिखती है। हो सकता है, ऐसे सूखे को कुदरती कहर मान लिया जाए और समाज से लेकर सरकार तक यहीं अपनी जिम्मेदारी पूरी समझ लें। किन्हीं वजहों से सूखा पड़ता है, तो बाढ़ जैसी आपदा इंसानी समाज को यह मौका भी देती है कि वह अपने बचाव और सुविधा के पूर्व इंतजाम कर ले। मगर शायद ही कहीं ऐसी आपदाओं से सबक लेकर कुछ सीखने की कोशिश की जाती है। कभी ऐसी समस्याओं से दो-चार होकर राजस्थान के कई इलाकों में कभी स्थानीय समुदायों ने जल संरक्षण के बारे में सोचा होगा और उसे ऐसा स्वरूप दिया कि आज वह दुनिया के दूसरे देशों के लिए प्रेरणा का विषय बन रहा है।

गौरतलब है कि राजस्थान में मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान के तहत प्रथम चरण में करीब चौरानबे हजार जल संरचनाओं का निर्माण कर जल संरक्षण की एक ठोस बुनियाद रखी गई है। पानी की समस्या से जूझते रहने वाले राजस्थान की इस योजना की काफी प्रशंसा हुई है। मंगलवार को उदयपुर में आपदा प्रबंधन के मुद्दे पर ब्रिक्स देशों के आपदा मंत्रियों के दो दिवसीय सम्मेलन के दौरान दक्षिण अफ्रीका के सहकारी शासन एवं परंपरागत मामले विभाग के मंत्री डेस वेन रोयीन ने कहा कि जल संरक्षण का जो मॉडल उन्होंने यहां देखा है, उससे इस मामले में कई नई बातें सीखी जा सकती हैं; वे इसे अपना कर अपने देश में सूखे की समस्या से निपटेंगे।

करीब तीन साल पहले खबर आई थी कि राजस्थान का एक चौथाई हिस्सा पूरी तरह रेगिस्तान में तब्दील हो चुका है। दूसरी ओर, दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में कभी-कभी अनियमित बरसात के चलते भारी मात्रा में वर्षा जल यों ही बेकार चला जाता है। इसीलिए समय के साथ वहां सामुदायिक स्तर पर जल संरक्षण के अनेक उपाय किए गए थे। मसलन, तालाब और बांध के अलावा वहां बावड़ी, कुआं, जोहड़, पाट, रपट, टांका, कुंड, झालरा वगैरह बना कर पानी जमा करने और जरूरत के वक्त इस्तेमाल करने के तरीके अपनाए गए थे। इन पारंपरिक उपायों में सस्ती, आसान तकनीक का इस्तेमाल होता था, जिसे स्थानीय लोग भी बिना किसी मुश्किल के बनाए रख सकते थे। जाहिर है, बरसात के मौसम में बेहिसाब पानी को जमा करने के उपाय राजस्थान के लोगों ने अभाव की वजह से अर्जित किए थे, लेकिन अब ये दुनिया के उन तमाम इलाकों के लिए प्रेरणा का काम कर रहे हैं, जहां पानी न होने के चलते व्यापक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

पिछले कुछ सालों से अक्सर ये बातें की जाती रही हैं कि अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा। इसकी झलक पानी की कमी से जूझते कई शहरों-महानगरों में अक्सर देखी जा सकती है। बल्कि भारत में ही कई ऐसे मौके सामने आ चुके हैं जब दो राज्य किसी नदी के पानी के बंटवारे के सवाल पर टकराते देखे गए। जाहिर है, अगर समय रहते जल संरक्षण के सस्ते, आसान और सुविधाजनक उपायों को बढ़ावा नहीं दिया गया तो पानी के बढ़ते संकट के नतीजों का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।

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