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संपादकीय: अवसर और अवरोध

नीति आयोग ने ‘न्यू इंडिया एट 75’ के लिए जो रणनीतिक दस्तावेज जारी किया है, उसमें यह सुझाव दिया गया है कि सिविल सेवा परीक्षा के लिए सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के अधिकतम आयु सीमा तीस से घटा कर सत्ताईस साल कर दी जानी चाहिए।

Author Published on: December 24, 2018 1:40 AM
नीति आयोग ने ‘न्यू इंडिया एट 75’ के लिए जो रणनीतिक दस्तावेज जारी किया है। (फोटो- पीटीआई)

सिविल सेवा परीक्षा में बैठने के लिए अधिकतम आयु सीमा घटाने की चर्चा ने एक बार फिर उन उम्मीदवारों को चिंता में डाल दिया है जो देश के भावी नौकरशाह बनने के लिए लंबे समय से सपने संजोते हैं और कड़ी मेहनत करते हैं। सिविल सेवा परीक्षा में बैठने के लिए अधिकतम आयु सीमा तय करने और अवसरों की संख्या घटाने-बढ़ाने की कवायद कई बार हो चुकी है। लेकिन सरकारें इस बारे में डर के मारे फैसला नहीं कर पातीं, ताकि युवा वर्ग और राजनीतिक दलों की नाराजगी न झेलनी पड़ जाए। हाल में यह मसला फिर से उठा है। नीति आयोग ने ‘न्यू इंडिया एट 75’ के लिए जो रणनीतिक दस्तावेज जारी किया है, उसमें यह सुझाव दिया गया है कि सिविल सेवा परीक्षा के लिए सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के अधिकतम आयु सीमा तीस से घटा कर सत्ताईस साल कर दी जानी चाहिए। आयोग ने इस काम को अगले तीन से चार साल के भीतर चरणबद्ध तरीके से करने का सुझाव दिया है। आयोग का यह सुझाव उन तमाम उम्मीदवारों के लिए झटका हो सकता है जो सिविल सेवा को अपने भविष्य के रूप में देखते हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि जब-जब भी इस तरह की बात उठी है तो उसका चौतरफा विरोध हुआ है। सिविल सेवा परीक्षा जितनी कड़ी मेहनत मांगती है, उसके लिए काफी वक्त चाहिए होता है। इस लिहाज से सत्ताईस साल की अधिकतम आयु सीमा को पर्याप्त नहीं माना जा सकता। ज्यादातर बच्चे बाईस से चौबीस साल में स्नातक-स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी कर पाते हैं और फिर सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी में जुटते हैं। ऐसे उम्मीदवार बड़ी संख्या में होते हैं, खासतौर से हिंदी भाषी प्रदेशों के, जो एक या दो बार की असफलता के बाद लगातार तीसरे अवसर में परीक्षा में नहीं बैठते, क्योंकि वे तैयारी के लिए वक्त चाहते हैं। इसके अलावा, ग्रामीण और पिछड़े इलाकों से आने वाले उम्मीदवारों के पास वे सुविधाएं नहीं होतीं जो महानगरों में रहते हुए तैयारी करने वालों को सहज उपलब्ध हैं। ऐसे में संपन्नता और सुविधाओं के अभाव में रह कर तैयारी करने वालों के लिए सत्ताईस साल की सीमा एक बड़ा अवरोध बन जाती है।

एक और अहम बात यह है कि ज्यादातर राज्यों में स्कूली और कॉलेज शिक्षा सत्र समय से नहीं चलते। हालत यह है कि सत्र दो-दो, तीन-तीन साल देरी से चल रहे हैं। ऐसे में अगर कोई इक्कीस साल की उम्र में स्नातक की परीक्षा पास कर सकता है तो वह तेईस से चौबीस साल में पास कर पा रहा है। तब सवाल उठता है कि सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के लिए ऐसे उम्मीदवारों को कैसे पूरे अवसर मिल पाएंगे। ऐसे में उम्मीदवार योग्यता या अयोग्यता से नहीं, बल्कि आयु सीमा पूरी होने की वजह से ही सिविल सेवा के अयोग्य हो जाएंगे। क्या यह हास्यास्पद नही हैं! सिविल सेवा परीक्षा में बैठने के लिए आयु सीमा और परीक्षा के प्रारूप में बदलाव के बारे में सुझाव देने के लिए सरकार ने पूर्व नौकरशाह बीएस बासवन की अध्यक्षता में समिति बनाई थी। बासवन समिति ने सिविल सेवा परीक्षा के लिए अधिकतम आयु सीमा सामान्य वर्ग के लिए पच्चीस साल, अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए अट्ठाईस और अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के लिए तीस साल करने का सुझाव दिया था। लेकिन इसका इतना विरोध हुआ कि सरकार ने इस रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया। हालांकि अब यह विवाद का विषय तो है ही कि नीति आयोग ने सिर्फ सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के लिए ही यह सुझाव दिया है, और वर्गों के लिए नहीं। ऐसा सुझाव सिविल सेवा को आकर्षक, तर्कसंगत और लोकोपयोगी बनाने के बजाय उसमें बैठने वाले उम्मीदवारों के बीच ही एक विभाजन रेखा खींच सकता है। कोई भी प्रतियोगिता तभी ज्यादा अच्छे परिणाम देती है जब उसमें भाग लेने वालों को समान अवसर दिए जाएं।

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