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संपादकीय: वापसी की राह

रोहिंग्या शरणार्थियों की म्यांमा वापसी तय करने के लिए राज्य सरकारों की ओर से उनकी पहचान से संबंधित जो आंकड़े जुटाए गए थे, वे केंद्रीय एजंसियों की ओर से पेश आंकड़ों से भिन्न पाए जा रहे थे।

Author October 9, 2018 2:14 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (फाइल फोटो- रॉयटर्स)

भारत में रह रहे रोहिंग्या शरणार्थियों को वापस म्यांमा भेजे जाने के दबाव के बीच सरकार को काफी सावधानी से इस ओर कदम उठाना पड़ रहा है तो यह स्वाभाविक ही है। एक बड़ी मुश्किल यह है कि भारत के सीमा-क्षेत्र में मौजूद अवैध रोहिंग्या शरणार्थियों की पहचान को लेकर कई जटिलताएं अभी भी मौजूद हैं। इसलिए शरणार्थियों के यहां रहने या वापस भेजे जाने की स्थिति में उनके लिए कोई उचित व्यवस्था करने में दिक्कतें हो रही हैं। इसके अलावा, संभव है म्यांमा सरकार के सामने भी यह सवाल हो कि अगर शरणार्थियों को वापस भेजा गया तो उनकी वास्तविक पहचान को लेकर कैसे निश्चिंत हुआ जा सकेगा कि वे म्यांमा के ही नागरिक हैं। शायद यही वजह है कि म्यांमा सरकार ने भारत से यहां अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्या शरणार्थियों की पहचान की पुष्टि के लिए जरूरी कदम उठाने का अनुरोध किया है। इसके मद्देनजर भारत सरकार ने सभी राज्य सरकारों से शरणार्थियों की मूल भाषा के आधार पर नए सिरे से आंकड़े जुटाने को कहा है। गौरतलब है कि भारत में दिल्ली सहित अलग-अलग राज्यों में करीब चालीस हजार रोहिंग्या शरणार्थी अवैध रूप से रह रहे हैं। करीब साल भर पहले अंग्रेजी भाषा वाले प्रारूप के आधार पर अवैध शरणार्थियों की पहचान की गई थी, ताकि उन्हें म्यांमा वापस भेजा जा सके। लेकिन अब म्यांमा दूतावास ने भारत सरकार को दो भाषाओं वाले फार्म का नया प्रारूप मुहैया कराया है, ताकि स्थानीय भाषा की जानकारी के आधार पर शरणार्थियों की पहचान सुनिश्चित हो सके।

दरअसल, रोहिंग्या शरणार्थियों की म्यांमा वापसी तय करने के लिए राज्य सरकारों की ओर से उनकी पहचान से संबंधित जो आंकड़े जुटाए गए थे, वे केंद्रीय एजंसियों की ओर से पेश आंकड़ों से भिन्न पाए जा रहे थे। इसलिए अच्छा है कि जिन शरणार्थियों को वापस भेजा जाना है, उनसे संबंधित पहचान की पुष्टि सभी पुख्ता प्रमाणों के साथ कर ली जाए। लेकिन यह देखने की बात होगी कि पहचान से संबंधित नए फार्म में जिस तरह शरणार्थियों से म्यांमा सरकार के दस्तावेज और भारत लाने वाले एजंट के बारे में जानकारी की मांग की गई है, उसे पूरा करने में कितने लोग सक्षम हो पाते हैं। यह समझना मुश्किल नहीं है कि चारों तरफ हिंसा के माहौल में अगर कोई व्यक्ति या परिवार उस जगह से अचानक पलायन करता है तो उसकी पहली प्राथमिकता जीवन बचाने की होती है। संकट का सामना करते हुए भी दस्तावेज जैसे जरूरी सामान की याद उसे बाद में आती होगी। फिर इतने समय बाद शरणार्थियों के सामने उन्हें भारत लाने वाले एजंट का ब्योरा मुहैया कराना भी एक चुनौती होगी। फिर भी कुछ खास दस्तावेज या जानकारी जुटा कर वास्तविक शरणार्थियों की पहचान हो पाती है तो अच्छा ही रहेगा।

लंबी कवायदों और कई तरह की औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद पिछले दिनों सात रोहिंग्या शरणार्थियों को म्यांमा भेजा जा सका। हालांकि अब सवाल यह उठ रहा है कि म्यांमा के भीतर अब भी रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर जैसा माहौल है, उसमें उन्हें वापस भेजना कितना उचित था। वहां सरकार को शांति कायम करने में अभी पूरी कामयाबी नहीं मिली है और शायद इसी के मद्देनजर रोहिंग्या कार्यकर्ताओं से लेकर संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजंसी तक ने म्यांमा में उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है। खबरें यहां तक आर्इं कि वहां जो बचे हुए लोग रह रहे हैं, वे भी अब बाहर जाने के बारे में सोच रहे हैं। फिर भारत से जिन शरणार्थियों को वहां भेजा जा रहा है, उनकी सुरक्षा कैसे तय होगी। जाहिर है, मानवाधिकारों से जुड़े सवालों के बीच भारत सरकार को कई औपचारिकताओं का खयाल रखने की जरूरत पड़ेगी।

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