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संपादकीय: हादसों का सिलसिला

सवाल है कि ट्रेनों के संचालन से जुड़े बुनियादी पहलुओं पर ध्यान देना और उसे पूरी तरह सुरक्षित बनाना किसकी जिम्मेदारी है। पटरियों की गुणवत्ता से लेकर रेलवे क्रॉसिंग पर कर्मचारी के मौजूद नहीं होने जैसी दूसरी तमाम वजहों से अक्सर रेल दुर्घटनाएं हो रही हैं।

Author October 11, 2018 2:55 AM
न्यू फरक्का एक्सप्रेस के छह डिब्बे जिस तरह पटरी से उतर गए, वह लगातार हादसों में सिर्फ एक कड़ी है।

किसी भी हादसे का सबक यह होना चाहिए कि वह भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचाव का आधार बने। लेकिन रेल महकमे को शायद इस बात से बहुत सरोकार नहीं है कि ट्रेन हादसों पर काबू पाने के पर्याप्त इंतजामों को प्राथमिकता में शुमार किया जाए। यह बेवजह नहीं है कि एक ही प्रकृति की दुर्घटनाएं बार-बार होती हैं और उनमें लोगों की जान जाती है, रेलवे का भी भारी नुकसान होता है। बुधवार को सुबह उत्तर प्रदेश में रायबरेली के हरचंदपुर स्टेशन के पास मालदा से दिल्ली की ओर जाते हुए न्यू फरक्का एक्सप्रेस के छह डिब्बे जिस तरह पटरी से उतर गए, वह लगातार हादसों में सिर्फ एक कड़ी है। इस हादसे में सात लोगों की मौत हो गई और पैंतीस घायल हो गए, जिनमें नौ की हालत ज्यादा गंभीर है। फिलहाल ट्रेन के पटरियों से उतरने का कारण नहीं बताया गया है, लेकिन खबर के मुताबिक घटना की जांच किसी आतंकी साजिश के पहलू से भी की जाएगी। ऐसे मौके पहले भी आए हैं जब ट्रेन के पटरी से उतरने के पीछे साजिश की आशंका जताई गई। लेकिन सच यह है कि अब तक मुख्य कारण पटरियों में गड़बड़ी या उनके रखरखाव में कमी के रूप में ही सामने आया है।

अब एक आम हो चुकी रिवायत के मुताबिक मृतकों और घायलों के लिए मुआवजे और इलाज की घोषणा के साथ-साथ भविष्य में ऐसे हादसों पर लगाम लगाने के आश्वासन दिए जाएंगे। लेकिन इन आश्वासनों की जमीनी सच्चाई यह है कि एक दुर्घटना के बारे में लोग भूल भी नहीं पाते कि फिर कोई नया हादसा सामने आ जाता है। हो सकता है कि ताजा दुर्घटना में मरने वालों और हताहतों की तादाद बड़ी नहीं मानी जाएगी, लेकिन किसी भी हादसे में जान गंवाने वालों की संख्या कितनी भी क्यों न हो हो, उसका महत्त्व समान माना जाना चाहिए। सवाल है कि यात्री जब सुरक्षित सफर के मकसद से ट्रेन का सहारा लेते हैं और इसकी पूरी कीमत चुकाते हैं, तो गंतव्य तक पहुंचने के बीच वे जान जाने के जोखिम से क्यों गुजरें? विडंबना यह है कि पिछले कुछ समय से जितनी भी रेल दुर्घटनाएं हो रही हैं, उनमें से ज्यादातर में कारण चलती ट्रेन का पटरी से उतर जाना है। अनेक अध्ययनों में यह तथ्य दर्ज किया जा चुका है कि पटरियों पर ज्यादा दबाव पड़ने की वजह से वे समय से पहले कमजोर पड़ जाती हैं। इसके बावजूद पटरियों पर ट्रेनों के दबाव को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा इंतजामों को पुख्ता करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जा पाते।

सवाल है कि ट्रेनों के संचालन से जुड़े बुनियादी पहलुओं पर ध्यान देना और उसे पूरी तरह सुरक्षित बनाना किसकी जिम्मेदारी है। पटरियों की गुणवत्ता से लेकर रेलवे क्रॉसिंग पर कर्मचारी के मौजूद नहीं होने जैसी दूसरी तमाम वजहों से अक्सर रेल दुर्घटनाएं हो रही हैं। लेकिन इसके लिए जिम्मेदार बड़ी खामियों को पूरी तरह दुरुस्त करने के बजाय सरकार सुरक्षा के नाम पर यात्रा को ज्यादा से ज्यादा महंगी बनाने और बुलेट ट्रेन या दूसरी शानो-शौकत वाली ट्रेनों के परिचालन के लिए बढ़-चढ़ कर दावा करने में लगी है। रेलगाड़ियों का सफर आम लोगों के लिए किस कदर मुश्किलों से भरा हो गया है, यह किसी से छिपा नहीं है। अपने गंतव्य तक जाने के लिए टिकट मिल पाने से लेकर समय पर कहीं पहुंच पाना अपने आप में एक आश्चर्य जैसा हो गया है। इसमें अब सफर के दौरान हादसों की वजह से जान पर जोखिम एक बड़ा सवाल है।

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