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संपादकीय: सेहत की फिक्र

इस योजना के तहत देश भर के दस करोड़ परिवारों यानी पचास करोड़ लोगों को सालाना पांच लाख रुपए तक की मुफ्त चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध हो सकेंगी। इसमें करीब साढ़े तेरह सौ बीमारियों की सूची बनाई गई, जिनका इलाज संभव हो सकेगा।

Author September 24, 2018 2:25 AM
इस योजना के तहत फिलहाल उनतीस राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के चार सौ पैंतालीस जिले लाभान्वित होंगे।

सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च पहुंच से दूर होने की वजह से करोड़ों गरीबों को समय पर माकूल चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पातीं। इसके चलते हर साल लाखों लोग असमय मौत के मुंह में या गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं। इसी समस्या से पार पाने के लिए प्रधानमंत्री ने आयुष्मान भारत यानी प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना की शुरुआत की है। इस योजना की घोषणा उन्होंने पंद्रह अगस्त को ही लालकिले से कर दी थी, पर औपचारिक रूप से इसकी शुरुआत झारखंड से की है। इस योजना के तहत फिलहाल उनतीस राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के चार सौ पैंतालीस जिले लाभान्वित होंगे। पांच राज्यों ने अभी इस योजना में खुद को शामिल नहीं किया है, क्योंकि वे या तो इसी तरह की अपनी कोई योजना शुरू करने वाले हैं या उनके यहां पहले से कोई ऐसी योजना चल रही है। इस योजना के तहत देश भर के दस करोड़ परिवारों यानी पचास करोड़ लोगों को सालाना पांच लाख रुपए तक की मुफ्त चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध हो सकेंगी। इसमें करीब साढ़े तेरह सौ बीमारियों की सूची बनाई गई, जिनका इलाज संभव हो सकेगा। देश के करीब दस हजार सरकारी और निजी अस्पतालों में ये सुविधाएं उपलब्ध होंगी। कुछ और निजी अस्पतालों के इस योजना से जुड़ने की उम्मीद है। इस तरह इस योजना का विस्तार होगा।

इसे दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना बताया जा रहा है। निस्संदेह यह योजना अगर ईमानदारी से लागू हो सकी, तो इससे गरीबों को बड़ी राहत मिलेगी। यह योजना मुख्य रूप से गरीबी रेखा के नीचे बसर कर रहे लोगों के लिए है। ऐसे लोग इलाज के लिए स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों या जिला अस्पतालों पर निर्भर रहते हैं। इन अस्पतालों में चिकित्सा सुविधाओं और दवाओं का अभाव होने की वजह से ऐसे लोगों को समुचित इलाज नहीं मिल पाता। निजी अस्पतालों की फीस भर पाना इनकी क्षमता के बाहर होता है। ऐसे में निजी अस्पताल भी इस योजना से जुड़ रहे हैं, तो बेहतर चिकित्सा की उम्मीद जगी है। मगर इस योजना को सफल बनाने के लिए जरूरी है कि पहले की कुछ योजनाओं से सबक लेते हुए निगरानी तंत्र को चौकस बनाया जाए। अभी तक के अनुभवों से जाहिर है कि तमाम स्वास्थ्य और स्वास्थ्य बीमा योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं, इसलिए वे अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पातीं। स्वास्थ्य बीमा की रकम के लोभ में निजी अस्पताल सरकारी योजनाओं में शामिल तो हो जाते हैं, पर योजना के मकसद के अनुरूप सेवाएं उपलब्ध नहीं कराते। इसलिए इस योजना को भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ने से रोकने पर गंभीरता से ध्यान देना होगा।

इस योजना पर मौजूदा वित्त में करीब साढ़े तीन हजार करोड़ रुपए का बोझ पड़ने का अनुमान है। इसके लिए केंद्र सरकार साठ फीसद और राज्य सरकारें चालीस फीसद धन मुहैया कराएंगी। केंद्र सरकार पहले ही दो हजार करोड़ रुपए की पेशगी रकम मुहैया करा चुकी है। स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़ी ऐसी योजनाओं के लक्ष्य तक न पहुंच पाने की एक बड़ी वजह यह भी रही है कि राज्य सरकारें अपने हिस्से का धन उपलब्ध नहीं करा पातीं और न योजना को ठीक से लागू करा पाने की दिशा में गंभीरता दिखाती हैं। उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य बीमा घोटाले का उदाहरण एक कड़वा अनुभव है। इसलिए इस दिशा में राज्य सरकारों की मुस्तैदी भी बहुत जरूरी है।

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