jansatta Editorial opinion artical Deadly Buildings about Buildings collapse In Greater Noida - संपादकीय: जानलेवा इमारतें - Jansatta
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संपादकीय: जानलेवा इमारतें

शाहबेरी गांव ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के इलाके में आता है और यहां किसी भी तरह का निर्माण प्रतिबंधित है। ऐसे में सबसे पहला सवाल तो यही उठ रहा है कि यहां निर्माण गतिविधियां आखिर चल किसके इशारे पर रही हैं।

Author July 20, 2018 9:20 AM
शाहबेरी गांव में हादसे के बाद रोते-बिलखते मारे गए लोगों के परिजन। फाइल फोटो

ग्रेटर नोएडा पश्चिम के शाहबेरी गांव में मंगलवार रात दो इमारतों के ढह जाने की घटना गंभीर और दहला देने वाली है। एक इमारत में लोग रह रहे थे और दूसरी निर्माणाधीन थी। मलबे से अब तक आठ शव बरामद किए जा चुके हैं, जबकि कइयों के दबे होने की आशंका है। यह हादसा रात सवा नौ बजे करीब हुआ था और उस वक्त ज्यादातर लोग घरों में ही थे। इस इमारत में ऐसे परिवार रह रहे थे जिन्होंने हाल ही में इसमें फ्लैट खरीदे थे। यह घटना बताती है कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा के गांवों में किस तरह से प्राइवेट बिल्डर नियम-कानूनों को ताक पर रखते हुए धड़ल्ले से कारोबार कर रहे हैं और प्रशासन आंख मूंदे हुए है। कहने को इस घटना के बाद प्रशासन हरकत में आया और पुलिस ने बिल्डर सहित चौबीस लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया। लेकिन सवाल है कि इस हादसे में हुई मौतों का गुनहगार आखिर कौन है? क्या सिर्फ बिल्डर जिम्मेवार है? या फिर उन अफसरों की भी जवाबदेही बनती है, जिनकी अनदेखी या मेहरबानी से इस तरह के कारोबार फल-फूल रहे हैं? घटिया निर्माण सामग्री, कमीशनखोरी, घूस, जिला और पुलिस प्रशासन की लापरवाही, प्राधिकरण में फैला भ्रष्टाचार जैसे कई कारण हैं जो इस तरह के हादसों को न्योता देते हैं।

इस हादसे ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। शाहबेरी गांव ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के इलाके में आता है और यहां किसी भी तरह का निर्माण प्रतिबंधित है। ऐसे में सबसे पहला सवाल तो यही उठ रहा है कि यहां निर्माण गतिविधियां आखिर चल किसके इशारे पर रही हैं। क्या प्रशासन में कोई यह देखने वाला नहीं है कि जहां निर्माण कार्यों पर पाबंदी है, वहां कैसे धड़ाधड़ इमारतें बनती जा रही हैं? अगर पाबंदी के बावजूद ऐसा होता है तो इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि यहां एक बड़ा गठजोड़ काम कर रहा है। इसलिए मृतकों के परिजनों ने इसे हादसा नहीं, हत्या कहा है। ऐसा भी नहीं है कि प्रशासन को इस तरह के अवैध निर्माण की भनक न लगी हो। इसी साल फरवरी और मार्च में मुख्यमंत्री के पोर्टल पर एक स्थानीय बाशिंदे ने शिकायत दर्ज कराई थी और बताया था कि इलाके में बड़े पैमाने पर जो अवैध इमारतें खड़ी की जा रही हैं, वे जानलेवा हो साबित सकती हैं।

दरअसल, यहां तमाम बिल्डरों ने जमीनें खरीद कर चार से आठ मंजिला इमारतें बना दी हैं। ज्यादा मुनाफे के चक्कर में इनमें जिस तरह की घटिया सामग्री लगाई जाती है, वही जानलेवा बन जाती है। बिल्डर किस तरह की निर्माण सामग्री इस्तेमाल कर रहे हैं, क्या इस बात की जांच करना प्रशासन और प्राधिकरण का काम नहीं है? जो इमारतें ढह गई हैं, उनके फ्लैट मालिकों का कर्ज अब कौन चुकाएगा? हैरानी की बात है कि शाहबेरी में सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में जमीन अधिग्रहण रद्द कर दिया था, फिर भी इमारतें खड़ी होती गर्इं और इस साल सैकड़ों फ्लैटों की रजिस्ट्री भी हो गई। यह सब कैसे होता चला गया? यह जांच का विषय है। अगर प्राधिकरण, जिला प्रशासन, पुलिस ने निगरानी रखने और नियम-कायदों का पालन सुनिश्चित करने की अपनी जिम्मेदारी निभाई होती तो शायद ऐसा हादसा न होता।

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