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संपादकीय: राव का दांव

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी ने भी राव से बात कर तीसरे मोर्चे पर सहमति जताई। इस बीच, ममता बनर्जी ने द्रमुक नेता एमके स्टालिन से भी तालमेल को लेकर बात की। राव भी चाहते हैं कि उनके मोर्चे में दक्षिण के अन्य नेता भी आएं।

Author Published on: March 7, 2018 3:40 AM
तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव

तेलंगाना राष्ट्र समिति के प्रमुख और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने तीसरा मोर्चा बनाने का राग छेड़ कर नए राजनीतिक समीकरणों की संभावना के संकेत दिए हैं। दरअसल, पूर्वोत्तर राज्यों में भाजपा की जोरदार जीत के बाद क्षेत्रीय दलों को नया मोर्चा खड़ा करने की जरूरत और ज्यादा महसूस हुई है। साल भर बाद लोकसभा चुनाव होने हैं। इसलिए गैर-राजग दलों को यह चिंता सताने लगी है कि भाजपा की बढ़ी हुई ताकत से कैसे निपटा जाए। सभी गैर-राजग पार्टियां कांग्रेस से हाथ नहीं मिला सकतीं, क्योंकि उनके राज्य में कांग्रेस उनकी प्रतिद्वंद्वी पार्टी है। इसलिए टीआरसी और बीजू जनता दल तीसरे मोर्चे की संभावना टटोलने में लगी हैं। इसमें ममता बनर्जी की भी दिलचस्पी हो सकती है, क्योंकि उनकी पुरानी प्रतिद्वंद्वी माकपा में कांग्रेस के साथ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मिलकर संयुक्त रणनीति बनाने पर मंथन चल रहा है। ममता बनर्जी के अलावा ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुसलमीन (आइएमआइएम) के नेता असदुद्दीन ओवैसी, झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, महाराष्ट्र के दो सांसदों सहित कई नेताओं ने राव की पहल का स्वागत किया है।

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी ने भी राव से बात कर तीसरे मोर्चे पर सहमति जताई। इस बीच, ममता बनर्जी ने द्रमुक नेता एमके स्टालिन से भी तालमेल को लेकर बात की। राव भी चाहते हैं कि उनके मोर्चे में दक्षिण के अन्य नेता भी आएं। राव ने तीसरे मोर्चे की चर्चा छेड़ने के साथ ही राजनीति में गुणवत्तापूर्ण बदलाव की बात कही है, पर यह किसी से छिपा नहीं है कि असल मकसद भाजपा से लड़ने की रणनीति बनाना है। राव राजनीति में गुणवत्तापूर्ण बदलाव का भरोसा कैसे दिला पाएंगे? जिस आंदोलन के नायकत्व के बल पर वे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहुंचे, वह तेलंगाना को अलग राज्य बनाने के लिए एक अस्मितावादी आंदोलन था। उन्होंने कुछ ऐसा नहीं किया है जिससे उनका नैतिक कद इतना बड़ा दिखता हो कि उसके आभामंडल में राजनीति में गुणवत्तापूर्ण बदलाव की उम्मीद पैदा हो सके। ऐसी उम्मीद देश में आम आदमी पार्टी ने जरूर जगाई थी, पर अब वह भी अन्य पार्टियों जैसी हो चुकी है। अलबत्ता टीआरएस और अन्य क्षेत्रीय दल चाहें तो संघीय ढांचे की रक्षा को जरूर एक जोरदार मुद्दा बना सकते हैं।

मोर्चे और विकल्प बनाने की कवायदें हर लोकसभा चुनाव के पहले होती रही हैं। लेकिन समस्या यह है कि अपने-अपने हितों को लेकर एकजुट होने वाले विपक्षी दल फौरी स्वार्थों के फेर में एकता तोड़ने में देर भी नहीं लगाते। इसीलिए कोई तीसरा विकल्प स्थायी शक्ल आज तक नहीं ले पाया। हाल में राव ने माकपा महासचिव सीताराम येचुरी से भी बात की थी। लेकिन वामदलों से ममता बनर्जी की पटरी नहीं बैठती। ऐसी सूरत में तीसरा मोर्चा बनने में यह एक बड़ा संकट तो बना रहेगा कि कौन इसमें आएगा और कौन नहीं। जबकि जरूरत सबको है साझा मंच की। उत्तर प्रदेश में एक-दूसरे की कट्टर दुश्मन समझी जाने वाली सपा-बसपा ने भी भाजपा से मुकाबले के लिए साथ आने के संकेत दिए हैं। अगर भाजपा-कांग्रेस से अलग एक राष्ट्रीय मंच तैयार करना है तो क्षेत्रीय दलों को मतभेद या अहं के झगड़े भुलाने ही होंगे। यह कई बार संभव हो जाता है बशर्ते राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व को लेकर आम सहमति हो। क्या ऐसा हो पाएगा?

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