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संपादकीय : विश्वास अविश्वास

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री जी परमेश्वर ने विश्वास मत से एक दिन पहले कहा कि कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री के रूप में पूरे पांच साल समर्थन करना है या नहीं, इस बारे में उनकी पार्टी ने अभी कोई निर्णय नहीं किया है।

Author May 26, 2018 3:29 AM
एचडी कुमारस्वामी के नेतृत्व में बनी जनता दल (एस) और कांग्रेस की साझा सरकार ने शुक्रवार को कर्नाटक विधानसभा में विश्वास मत हासिल कर लिया। (image source-Facebook)

एचडी कुमारस्वामी के नेतृत्व में बनी जनता दल (एस) और कांग्रेस की साझा सरकार ने शुक्रवार को कर्नाटक विधानसभा में विश्वास मत हासिल कर लिया। विश्वास मत के पक्ष में एक सौ सत्रह वोट पड़े। बहुमत के लिए न्यूनतम संख्या की शर्त एक सौ तेरह की थी। जाहिर है, यह मामूली बहुमत वाली सरकार है। पर अगर इस सरकार की स्थिरता को लेकर अभी से संदेह जताए जा रहे हैं, तो इसके पीछे दूसरी वजहें अधिक हैं। कांग्रेस और जनता दल (एस) का गठबंधन चुनाव बाद का है। दोनों पार्टियों ने न सिर्फ भाजपा पर बल्कि एक दूसरे पर भी कीचड़ उछालते हुए चुनाव लड़ा। पूर्व मुख्यमंत्री और चुनाव के दरम्यान कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार रहे सिद्धारमैया ने तो जनता दल (एस) को भला-बुरा कहते हुए उसे भाजपा की ‘बी-टीम’ तक कहा था। चुनाव बाद उसी जनता दल (एस) को गले लगाने में कांग्रेस को कतई संकोच नहीं हुआ, क्योंकि अपने बूते बहुमत पाने की हसरत पूरी होना तो दूर, उसकी सीटें एक सौ बाईस से घट कर अठहत्तर पर आ गर्इं। फिर भी वह सरकार बनाने की जोड़-तोड़ में जुट गई और सत्ता में बने रहने के लिए उसने एचडी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री के तौर पर कबूल करने की जद (एस) की शर्त मान ली, जिसके सिर्फ सैंतीस विधायक हैं।

अगर कांग्रेस ने इतना झुक कर गठबंधन करना स्वीकार किया, तो इसके पीछे कर्नाटक में भाजपा को सत्ता से दूर रखने की उसकी इच्छा या रणनीति ही शायद पहली वजह रही होगी। लेकिन इस गठबंधन की मुश्किलें अभी से जाहिर होने लगी हैं। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री जी परमेश्वर ने विश्वास मत से एक दिन पहले कहा कि कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री के रूप में पूरे पांच साल समर्थन करना है या नहीं, इस बारे में उनकी पार्टी ने अभी कोई निर्णय नहीं किया है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि कुमारस्वामी को कांग्रेस ने कितने बेमन से मुख्यमंत्री माना होगा। पर इसके पीछे कांग्रेस की जो रणनीति रही है उसी से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव तक कांग्रेस कुछ ऐसा नहीं करेगी, जिससे राज्य सरकार की स्थिरता खतरे में पड़े। लेकिन कर्नाटक के अपने नेताओं की महत्त्वाकांक्षाओं और आपसी झगड़ों को काबू में रखना उसके लिए आसान नहीं होगा। फिर, अगले लोकसभा चुनाव के ही मद्देनजर सरकार को आए दिन घेरने में भाजपा कोई कसर नहीं छोड़ेगी, और इसकी शुरुआत उसने विश्वास मत के दिन ही सदन का बहिष्कार करके कर दी।

भाजपा बार-बार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि सबसे बड़ी पार्टी के नाते सरकार बनाने का हक तो उसका था, और दूसरे यह कि कांग्रेस और जनता दल (एस) चुनाव मैदान में एक दूसरे के खिलाफ थे, इसलिए उनका गठबंधन अनैतिक और अपवित्र है। लेकिन यह सब कहते हुए भाजपा यह भुला देना चाहती है कि वह सबसे बड़ी पार्टी न होते हुए भी किस-किस राज्य की सत्ता पर काबिज हो गई, यह दलीलदेते हुए कि उसे सीटें चाहे जितनी मिली हों, उसने बहुमत तो जुटा लिया। पर अपना ही यह तर्क उसे कर्नाटक में तकलीफदेह मालूम पड़ता है! एक समय जिन सुखराम के भ्रष्टाचार के खिलाफ भाजपा ने तेरह दिन तक संसद नहीं चलने दी थी, उन्हीं से हिमाचल प्रदेश में सरकार बनाने के लिए हाथ मिलाने में उसे कोई अपवित्र गठबंधन नहीं दिखा था। बिहार में चुनाव मैदान में नीतीश और भाजपा एक दूसरे के खिलाफ थे, पर अब साथ-साथ सत्ता में हैं। जाहिर है, कर्नाटक में हर तरफ से, जो हुआ वह सत्ता-स्वार्थ के लिए जोड़-तोड़ के सिवा और कुछ नहीं था।

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