ताज़ा खबर
 

संपादकीय: जरूरत की ऊर्जा

भारत के समक्ष आज सबसे बड़ी चुनौती सवा अरब से ज्यादा आबादी को सस्ती बिजली मुहैया कराने की है। अभी देश में ज्यादातर बिजली का उत्पादन कोयले पर निर्भर है। बिजलीघरों को कोयले की कमी की समस्या से जूझना पड़ रहा है।

Author March 13, 2018 4:40 AM
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों।

ऊर्जा संकट से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन ने जो पहल की है, वह पूरी दुनिया को इस गंभीर समस्या से निजात दिलाने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकती है। चाहे विकसित हों या विकासशील देश, ऊर्जा का गंभीर संकट सबके सामने है। विकासशील देशों के सामने यह चुनौती ज्यादा बड़ी है। ऐसे में अगर भारत अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन की स्थापना से लेकर उसे लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए नेतृत्व की भूमिका में आए तो यह एक बड़ी उपलब्धि होगी। दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन के पहले सम्मेलन में शिरकत करने वाले बासठ देशों ने ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने के लिए सौर ऊर्जा का उत्पादन और इस्तेमाल बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई है। अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन की अहमियत इसलिए भी बढ़ गई है कि पेरिस समझौते के तहत सदस्य देशों को सौर ऊर्जा के इस्तेमाल, उसके लिए शोध, परियोजनाओं के लिए पैसे जैसी सारी जरूरतें इसी के जरिए पूरी की जाएंगी। इसका मुख्यालय गुरुग्राम में होगा, जिसके लिए भारत ने छह करोड़ बीस लाख डॉलर दिए हैं। इस सम्मेलन को अमली जामा पहनाने के पीछे सबसे बड़ी भूमिका फ्रांस की रही है, जिसने इस संगठन को खड़ा करने में भारत के साथ मिल कर काम किया। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने मिर्जापुर जिले में उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े सौर ऊर्जा संयंत्र का लोकार्पण भी किया। गौरतलब है कि इस संयंत्र को फ्रांस की कंपनी ने ही बनाया है। इसमें एक करोड़ तीस लाख यूनिट बिजली हर महीने बनेगी।

भारत के समक्ष आज सबसे बड़ी चुनौती सवा अरब से ज्यादा आबादी को सस्ती बिजली मुहैया कराने की है। अभी देश में ज्यादातर बिजली का उत्पादन कोयले पर निर्भर है। बिजलीघरों को कोयले की कमी की समस्या से जूझना पड़ रहा है। खासतौर पर गरमी के मौसम में बिजली का संकट तब और बढ़ जाता है जब मांग की तुलना में बिजलीघर उत्पादन नहीं कर पाते और इसके पीछे सबसे बड़ा कारण बिजलीघरों को समय पर पर्याप्त कोयला नहीं मिल पाना है। जाहिर है, आने वाले वक्त में संकट और गहरा सकता है। ऐसे में भारत के लिए ऊर्जा का वैकल्पिक स्रोत तलाशना जरूरी है। सौर ऊर्जा इसका सबसे सस्ता और कारगर विकल्प साबित हो सकती है। भारत ने अगले पांच साल में सौर ऊर्जा से पौने दो खरब वाट बिजली बनाने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए तिरासी अरब डॉलर की जरूरत पड़ेगी। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रधानमंत्री ने सौर परियोजनाओं के लिए सस्ता और बिना जोखिम वाला कर्ज देने की भी वकालत की।

सौर ऊर्जा का इस्तेमाल हर लिहाज से लाभदायक है। इससे बनने वाली बिजली न केवल सस्ती होगी, बल्कि इससे इन कारखानों से होने वाले प्रदूषण से भी निजात मिलेगी। कोयले से चलने वाले बिजलीघर जिस कदर राख और धुआं छोड़ते हैं, वह पर्यावरण के लिहाज से और जीवन के लिए खतरनाक है। सौर ऊर्जा के इस्तेमाल से कोयले जैसे प्राकृतिक स्रोत पर निर्भरता कम या फिर खत्म होगी। सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने जो दस सूत्री कार्रवाई योजना पेश की है, उसमें सभी राष्ट्रों को सस्ती सौर प्रौद्योगिकी मुहैया कराना, ऊर्जा मिश्रण में फोटोवोल्टिक सेल से उत्पादित बिजली का हिस्सा बढ़ाना, सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए नियमन और मानदंड बनाना, बैंक कर्ज के लिए सौर परियोजनाओं के लिए सलाह देना और विशिष्ट सौर केंद्रों का नेटवर्क बनाना शामिल है। सौर नीतियों, परियोजनाओं और राष्ट्रीय सौर मिशन जैसी पहलकदमी के जरिए अगर आम लोगों तक सौर ऊर्जा का फायदा पहुंचता है तो निश्चित ही भारत को भविष्य में ऊर्जा संकट से निपटने में कामयाबी मिलेगी।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App