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दूरंदेशी से दूर

आखिरकार शनिवार को जम्मू के सिख समुदाय की लगभग सभी मांगें राज्य सरकार ने मान लीं। इससे जम्मू में हालात जल्दी ही सामान्य हो जाने की उम्मीद की जा सकती है। जम्मू-कश्मीर ऐसा राज्य है जहां विरोध-प्रदर्शनों से निपटने में पुलिस से संवेदनशीलता और दूरदर्शिता की खास अपेक्षा की जानी चाहिए। पर इसके विपरीत वह […]

Author Updated: June 8, 2015 3:50 PM

आखिरकार शनिवार को जम्मू के सिख समुदाय की लगभग सभी मांगें राज्य सरकार ने मान लीं। इससे जम्मू में हालात जल्दी ही सामान्य हो जाने की उम्मीद की जा सकती है। जम्मू-कश्मीर ऐसा राज्य है जहां विरोध-प्रदर्शनों से निपटने में पुलिस से संवेदनशीलता और दूरदर्शिता की खास अपेक्षा की जानी चाहिए। पर इसके विपरीत वह अनेक मौकों पर उतावली और गैर-आनुपातिक कार्रवाई का परिचय देती रही है। घाटी में कई बार ऐसा हो चुका है कि छोटे-मोटे विरोध प्रदर्शन की परिणति व्यापक जन-असंतोष में हो गई और यहां तक कि उसने हिंसक रुख भी अख्तियार कर लिया। यह बात जम्मू में पिछले हफ्ते की घटनाओं के मद्देनजर भी लागू होती है। जनरैल सिंह भिंडरांवाले का पोस्टर हटाए जाने के विरोध में सिख समुदाय के कुछ लोग सड़कों पर उतर कर विरोध जता रहे थे।

जब भी ऑपरेशन ब्लू स्टार की याद दिलाने वाली तारीख निकट आती है, कई सिख संगठन जुलूस निकालने, सभा या दूसरे कार्यक्रम करने की तैयारी में जुट जाते हैं। इस क्रम में अगर कुछ लोगों ने भिंडरांवाले के पोस्टर लगाए, तो प्रशासन की निगाह में यह कितना भी गलत रहा हो, उसे उकसावे में आने की जरूरत नहीं थी। पोस्टर हटाए जाने के बाद हुए विरोध-प्रदर्शनों के दौरान छिटपुट पत्थरबाजी हुई। पर इसे भी पुलिस फायरिंग का पर्याप्त कारण नहीं माना जा सकता। मगर पुलिस ने गोली चलाई, जिसके फलस्वरूप एक युवक की जान चली गई। फिर सिख समुदाय का गुस्सा और भड़का, और उन्होंने शहर के कई हिस्सों में बंद कराने के अलावा जम्मू-पठानकोट राष्ट्रीय राजमार्ग को अवरुद्ध कर दिया। इस सब से निपटने के लिए राज्य सरकार ने जम्मू के सिख बहुल इलाकों में कर्फ्यू लगा दिया और वहां इंटरनेट सेवा बंद कर दी।

बहरहाल, यह सारा वाकया एक ऐसी समस्या की ओर इंगित करता है जो अतिवादी रुझानों से पैदा होती है। एक तरफ आंदोलनकारी विरोध-प्रदर्शन की सीमाएं लांघ जाते हैं। दूसरी तरफ पुलिस और प्रशासन तंत्र अपनी कार्रवाई में सूझ-बूझ से काम नहीं लेता। स्थिति का ठीक आकलन करने और एहतियात बरतने में कोताही की जाती है। फिर बाद में जब हालात नियंत्रण से बाहर जाते मालूम पड़ते हैं, तो उस पर काबू पाने के लिए जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया जाता है। भीड़ के प्रबंधन और आनुपातिक कार्रवाई की समझ पुलिस के प्रशिक्षण का हिस्सा क्यों नहीं बन पाई है? पिछले साल भी ऑपरेशन ब्लू स्टार को याद करने के मौके पर स्वर्ण मंदिर परिसर में दो गुटों के बीच हिंसक टकराव हुआ था। इस बार फिर उसी परिसर में शिरोमणि गुरद्वारा प्रबंधक समिति के रक्षकों और एक सिख संगठन के लोगों के बीच झड़पें हुर्इं। लेकिन जम्मू में जो हुआ उसे तो किसी सिलसिले की कड़ी नहीं कहा जा सकता। वहां हालात बेकाबू दिखने पर सेना तैनात करनी पड़ी और केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने राज्य सरकार को आश्वासन दिया कि जरूरत पड़ी तो और सुरक्षा बल भेजे जाएंगे। राज्य सरकार और जम्मू के सिख समुदाय के बीच हुई बातचीत के बाद अब शायद इसकी जरूरत न पड़े। पर सवाल है कि पिछले हफ्ते जम्मू में पुलिस और प्रशासन ने जो अपरिपक्वता दिखाई, उससे राज्य सरकार ने क्या सबक लिया है।

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